BJP-त्रिवेन्द्र पर बहुत भारी पड़ेगी हर एक दिन की देरी

Chetan Gurung

उत्तराखंड सियासत और खास तौर पर बीजेपी के साथ ही मीडिया में सबसे बड़ा सवाल लंबे समय से मंत्रिपरिषद विस्तार बना हुआ है। उत्तराखंड बीजेपी के मुखिया बंशीधर भगत के साथ ही खुद मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत साफ बोलते रहे हैं कि विस्तार होगा। कब होगा, ये अलबत्ता कभी साफ दोनों में से कोई नहीं कर पाए हैं। अंदरखाने की खबर ये है कि त्रिवेन्द्र जल्द से जल्द विस्तार को अंजाम दे के विधानसभा चुनाव की जोरदार तैयारियों में खुद को झोंक डालना चाहते हैं। कद्दावर नेता और देश के गृह मंत्री अमित शाह से इस बारे में अंतिम हरी झंडी लेनी है, जिसके लिए वह वक्त ही नहीं दे रहे।

शाह भले राष्ट्रीय अध्यक्ष नहीं हैं, लेकिन पार्टी में उनका ही सिक्का चलता है। देश ही नहीं, किस प्रदेश में किस किस्म की चालें चली जाएंगी, इसको आकार और गति वही देते हैं। इस मामले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ से उनको पूरी छूट है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा हैं, लेकिन माना जाता है कि वह भी कोई अहम फैसला शाह से पूछ के ही लेते हैं। उत्तराखंड में मंत्रिपरिषद विस्तार को नड्डा का समर्थन मुख्यमंत्री को हासिल हो चुका है। ऐसा सूत्र बता रहे हैं।

इसमें देरी सिर्फ शाह की मंजूरी न मिलने के कारण हो रही है। शाह पहले बिहार चुनाव के कारण व्यस्त रहे, भले सामने नहीं आए। फिर पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव की रणनीतियों को अंजाम देने में व्यस्त दिख रहे हैं। ऐसे में उनका वक्त उत्तराखंड में मंत्रिपरिषद विस्तार के लिए ले पाना त्रिवेन्द्र के लिए ख़ासी बड़ी चुनौती साबित हो रहा है। उनकी हर प्रेस कॉन्फ्रेंस में मंत्रिपरिषद विस्तार से जुड़ा सवाल जरूर उठता है। प्रदेश अध्यक्ष भगत भी इस सवाल का जवाब देते-देते परेशान से हो गए हैं।

सूत्रों के मुताबिक वह खुद कई बार मुख्यमंत्री से इस मसले को जल्द से जल्द निबटा देने के लिए कह चुके हैं। हकीकत ये है कि दोनों के हाथों में इस मसले की कमान नहीं है। सियासी समीक्षकों की राय है कि मंत्रिपरिषद विस्तार के जरिये पार्टी अपने कुछ नाखुश-असंतुष्ट और मजबूत विधायकों का मन बदल सकती है। विधानसभा चुनाव के लिए उनमें जोश भर सकते है। कुछ कमजोर और प्रदर्शन न कर पाने वाले या फिर विवादों में घिरे रहने वाले मंत्रियों की भी छुट्टी कर और मंत्रियों के लिए जगह बनाई जा सकती है। इसमें जितनी देरी होगी उतना नुक्सान बीजेपी को होगा। त्रिवेन्द्र के लिए मिशन-22 उतना कठिन होता चला जाएगा।

3 कुर्सी मंत्रिपरिषद में खाली है। कम से कम 3 मंत्रियों को हटाया जाता है तो कुल 6 नए चेहरों को मंत्रिपरिषद या मंत्रिमंडल में शामिल किया जा सकता है। विधानसभा चुनाव में अब वक्त कम है। ऐसे में जल्दी मंत्रिपरिषद विस्तार और नए चेहरों को मौका नहीं दिया जाता है तो फिर विस्तार सिर्फ निरर्थक औपचारिकता भर रह जाएगी। ये तो तय है कि अगला विधानसभा चुनाव बहुत घनघोर होने वाला है। त्रिवेन्द्र को न सिर्फ फूँक-फूँक के बल्कि संतुलित और तेज चालें भी चलनी होंगी। मंत्रिपरिषद विस्तार में हर एक दिन की देरी उनके लिए भारी साबित हो सकती है। विधायकों में अगर देरी और चुनाव करीब होने के चलते मंत्री बनने को ले के दिलचस्पी खत्म हो गई तो निजी तौर पर त्रिवेन्द्र के लिए ये हालात भारी पड़ सकते हैं। भले देरी के लिए जिम्मेदार कोई भी हो। मटका उनके सिर पर ही फूटेगा।  

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