Home Uncategorized नए DGP से उम्मीदें::स्मार्ट संग संवेदनशील पुलिस की दरकार

नए DGP से उम्मीदें::स्मार्ट संग संवेदनशील पुलिस की दरकार

0
7

The Corner View

Chetan Gurung

बहुत पुरानी बात है। मैं बाइक पर विधानसभा जा रहा था। सत्र जारी था। बुद्ध चौक पर ही एक पुलिस के जवान ने हाथ दे के रुकने का ईशारा किया तो रुक गया। आई फ्लू होने के कारण काला चश्मा पहना था। हेल्मेट फिट न आने के कारण उतारा हुआ था। इसी लिए रोका गया था। मुझे अंदाज था। पुलिस के जवान ने बिना कुछ बोले सीधे बाइक की चाबी निकाली और चल दिया। ये कहते हुए कि दारोगा (TSI) जी से बात करो। दारोगा जी अपनी बुलेट पर बैठ के चालान भर रहे थे। मैंने उनको समझाने की कोशिश की कि साहब फ्लू के कारण धूप का चश्मा है। चश्मे के कारण हेल्मेट नहीं लग रहा। उसने देखने की भी जरूरत नहीं समझी। उसी वक्त किसी वजह से तब के DGP प्रेमदत्त रतूड़ी का फोन आया तो मैंने उनको हाल बता दिया। उन्होंने अपनी बात TSI से कराने को कहा। उन्होंने फोन पर जो भी कहा हो, लेकिन दारोगा जी ने ये कहते हुए चाबी लौटा दी कि आपने एक अदने से सब इंस्पेक्टर की बात सीधे DGP साहब से करा दी। आपके कारण मुझे फटकार पड़ गई।

Chetan Gurung

एक किस्सा ताजा है। कार में सवार एक महिला ने लगातार उल्टियों के कारण अपना मास्क नीचे किया था। उसकी बुरी दशा थी। नैनीताल का वाकया है। शहर में प्रवेश करते ही पुलिस ने धर दबोचा कि मास्क नीचे कैसे है। दुर्योग से सीट बेल्ट भी नहीं लगी थी। पुलिस ने धाड़ से 1000 रुपए का चालान भरना शुरू किया। कार सवार भी समझ गए कि पुलिस बिल्कुल भी वजह सुनने के मूड में नहीं है। उसकी दिलचस्पी सिर्फ 1000 रुपए की वसूली में है। उन्होंने कुछ परिचित अफसरों से बात कर हालात बताए। तब जा के उनको छोड़ा गया। बाहर से आए पर्यटकों के साथ, जिनकी गाड़ियों के नंबर नैनीताल के नहीं थे, उनसे पुलिस कोई ढिलाई करने को राजी नहीं दिख रही थी। ये बात अलग है कि पूरे बाजार में तमाम स्थानीय लोग बिना मास्क के घूम रहे थे, जो पुलिस को दिखाई नहीं दे रहे थे।

एक और किस्सा। सचिवालय के बगल में स्थित क्रॉस रोड मॉल के बाहर दोपहिया खड़ा किया हुआ था। पार्किंग लाइन के भीतर। वापसी में देखा तो ट्रैफिक पुलिस के एक दारोगा और एक सिपाही चालान भर रहे थे। मैंने गुहार की कि चालान क्यों? गाड़ी तो पार्किंग लाइन के भीतर है। अबकी बार लाजवाब करने वाला जवाब उस टीएसआई की तरफ से आया। भाई साहब मार्च का महीना है। ज्यादा से ज्यादा चालान कर जुर्माना जमा कराना है। मैंने दारोगा जी से भौंचक्का हो के वजह जानी। पता चला कि उनको अपना राजस्व लक्ष्य पूरा करना है। सच कहूँ तो उस सज्जन युवा दारोगा ने मुझे तो बातचीत के बाद बिना चालान के छोड़ दिया। ये मामला दो साल पुराना है। ये समझ आ गया कि पुलिस भी अब राजस्व वसूली लक्ष्य में लगाई जा चुकी है। CPU भी ये ही काम खूब करती है। बजाए शातिर अपराधियों को फटाफट पकड़ने या जुर्म रोकने के।

ये सब क्यों लिख रहा हूँ? इसकी वजह है। उत्तराखंड के नए पुलिस महानिदेशक के तौर पर 30 नवंबर को अशोक कुमार कामकाज संभाल लेंगे। पे लेवल मैट्रिक्स-17 में प्रोन्नति के साथ ही उनको मौजूदा पुलिस प्रमुख अनिल रतूड़ी का उत्तराधिकारी सरकार ने घोषित कर दिया है। उन्होंने उत्तराखंड पुलिस को देश की सबसे स्मार्ट पुलिस बनाने का ईरादा जताया है। ये बहुत अच्छी और नए जमाने की सोच के हिसाब से उत्तम कदम होगा। अशोक को आम लोगों से मिलने-जुलने और सामाजिक तौर पर सक्रिय रहने से गुरेज न करने वाले IPS अफसर के तौर पर जाना जाता है। सामान्य पुलिस अफसरों के विपरीत उनसे मिलने और गुहार करने में आम लोग सहज महसूस करते हैं। रतूड़ी के बाद वही उत्तराखंड पुलिस के बॉस बनेंगे, ये तय था। उनको चुनौती देने के लिए कोई था भी नहीं। उनसे ये उम्मीद रखना कतई अव्यवहारिक और गलत नहीं होगा कि वह पुलिस को मानवीय और संवेदनशील-व्यावहारिक सूरत भी प्रदान करेंगे।

उत्तराखंड पुलिस को यूं भी मित्र पुलिस के तौर पर देश भर में जाना जाता है। इस टैग को कायम रखना नए पुलिस चीफ की अहम चुनौती होगी। उत्तराखंड में पर्यटक अधिक से अधिक आएँ। यहाँ की कुदरती खूबसूरती-साफ आबोहवा का लुत्फ लें। यहाँ के लोगों का कारोबार बढ़ाएँ। इसके लिए पुलिस का व्यवहार बहुत मायने रखता है। सिर्फ बाहर का नंबर देख के गाड़ियों का चालान बेवजह या फिर छोटी-छोटी वजहों से किया जाना ठीक नहीं। पर्यटकों-बाहरियों को परेशान करने का एहसास कराना पुलिस नहीं पूरी देवभूमि की गलत तस्वीर पेश करेगी। ऐसे अनुभव के बाद पर्यटक दुबारा न तो खुद आएगा न ही किसी और को यहाँ आने की राय ही देगा। नैनीताल का ही 5 साल पुराना निजी अनुभव है। तल्ली ताल में मॉल रोड के करीब गाड़ी पार्क करने के बाद रात को जब उसको निकालने के लिए गाड़ी रिवर्स गियर में डाली तो पीछे खड़ी कार को हल्का सा स्पर्श सा हुआ।

बस उस कार का स्वामी जो, स्थानीय था, और अच्छी-ख़ासी पिए हुए था, ने पुलिस बुला ली। उसने शिकायत कर दी कि उसकी गाड़ी को टक्कर मार दी। कोतवाल खुद आए। बाहर की गाड़ी देखी तो फटाफट कार की चाबी निकाल ली। लगे धमकाने। मैंने समझाने की कोशिश की। जब गाड़ी बैक करने के लिए बैठा तो पीछे कुछ नहीं था। रात 10 बजे अचानक कोई अपनी कार पीछे लगा दे और उसी वक्त बैक करते समय कार से छुअन हो जाना बड़ी बात नहीं। उसकी कार में सामने हल्का सा खरोंच था। न कोतवाल न ही वह बंदा राजी था कि खरोंच ठीक कराने के लिए हजार-पाँच सौ, जो भी लगे ले लिया जाए। वे दोनों एक-दूसरे को अच्छे से जानते थे। सो अड़ गए कि हमको तो आप ही गाड़ी पूरी सही कर के दो। मैंने कहा कि जब खरोंच सामने है तो पूरी गाड़ी क्यों ठीक कराई जाए! उनको ये भी समझाने की कोशिश की कि मुझे सुबह 5 बजे वापिस जाना है। कैसे गाड़ी ठीक करा सकता हूँ। दोनों नहीं माने।

फिर मुझे भी मजबूरन अपने दाँवपेंच इस्तेमाल करने पड़े। कोतवाल साहब ने चुपके से चाबी लौटा दी। अड़ियल स्थानीय कार चालक भी खिसक लिया। पुलिस ही ऐसा महकमा है, जिसका अच्छा या बुरा बर्ताव बाहरियों-आम लोगों या फिर पर्यटकों के मन-मस्तिष्क में वास्तविक और गहरी छाप छोड़ता है। अशोक के पुलिस महानिदेशक बनने के बाद उम्मीद की जा सकती है कि पुलिस सिर्फ कानून का डंडा ही न दिखाए। मानवीय और व्यावहारिक पहलू भी देखे। अमेरिका में एक वयोवृद्ध चीफ जज हैं `फ्रैंक कैप्रियो’। वह दोषी को दंड देते समय भी सहृदय-हंसमुख रहते हैं। उनकी कोर्ट कार्रवाई TV पर प्रसारित की जाती है। जो बहुत लोकप्रिय भी है। उनकी लोकप्रियता का आलम ये है कि कई मुलजिम उनकी अदालत में पेश होने और उनसे मिल के बहुत खुश हो जाते हैं। ऐसा नहीं है कि कैप्रियो गलत फैसले देते हैं। या मुलजिमों को दंडित किए बिना छोड़ के कानून का उल्लंघन कर रहे हैं। वह सिर्फ कानून के अंतर्गत और हालात को देख के व्यावहारिक रूप से उचित दंड तय करते हैं। उत्तराखंड या देश भर की पुलिस को उनके वीडियो जरूर दिखाए जाने चाहिए जो You Tube पर `Cought in Providence’ शो के तौर पर उपलब्ध हैं।   

NO COMMENTS

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

You cannot copy content of this page