लोगों की नाराजगी-असंतोष को भुनाने के फेर में केजरीवाल

मनीष सिसौदिया को सौंपी केजरीवाल ने देवभूमि फतह अभियान की कमान

Chetan Gurung

दिल्ली राज्य में धमाकेदार प्रदर्शन के साथ लगातार 3 बार सत्ता संभालने वाली आम आदमी पार्टी उत्तराखंड में सत्तारूढ़ बीजेपी और सत्ता में अंदर-बाहर होती रहने वाली काँग्रेस को तगड़ा झटका दे तो ताज्जुब नहीं होगा। दोनों दलों के मौजूदा हालात इसमें उसकी मदद कर सकते हैं। आप प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने देवभूमि में पूरी ताकत झोंकना शुरू कर दिया है। सवा साल बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में `आप’ भले सरकार न बनाए पर वह राज्य के दोनों प्रमुख राष्ट्रीय दलों का खेल निश्चित तौर पर बिगाड़ सकती है।

आप ने दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया को उत्तराखंड फतह अभियान की कमान थमा रखी है। मनीष उत्तराखंड का दौरा लगातार कर रहे हैं। स्थानीय प्रमुख लोगों से मिल रहे हैं। राज्य की नब्ज की थाह ले रहे हैं। क्या समस्या और मुद्दे चुनाव में हो सकते हैं। इसका अध्ययन कर रहे हैं। पूर्व नौकरशाह पार्टी से जुड़ने लगे हैं। संभावना जताई जा रही है कि काँग्रेस से बीजेपी में गए कुछ विधायकों के साथ ही काँग्रेस में भविष्य न देखने वाले भी चुनाव से पहले `आप’ की बांह थाम सकते हैं।

इसके बावजूद आप और इसके मुखिया अरविंद केजरीवाल के लिए उत्तराखंड की जंग जीतना दिल्ली सरीखा साबित शायद ही हो। दिल्ली जीतने के लिए केजरीवाल ने जबर्दस्त माहौल बहुत पहले बना दिया था। चुनाव के दौरान आप की खातिर स्वयंसेवकों की फौज दिल्ली की सड़कों पर जूझते हुए काम करती दिखाई देती थी। इनमें नौकरशाह-फौजी-पेशेवर और अन्य तबके के लोग शामिल थे। केजरीवाल तब बेदाग थे। विवादों से परे। इस सबसे माहौल बना। अब ऐसा नहीं है। फिर दिल्ली और वहाँ की संस्कृति उत्तराखंड से एकदम जुदा है।

उत्तराखंड में तस्वीर अलग है। यहाँ के लोगों के दिलो दिमाग पर आज भी सिर्फ काँग्रेस-बीजेपी हावी है। दोनों के तिलिस्म और मन मस्तिष्क में चिपकी उसकी जम चुकी मिट्टी को हटाना केजरीवाल-मनीष की जोड़ी के लिए बेहद कठिन चुनौती साबित होगी। `आप’ को बीजेपी के प्रति लोगों की घटती दिलचस्पी और विश्वास के साथ ही काँग्रेस के मरियल-लचर-टूटे-फूटे प्रदर्शन के चलते देवभूमि में अपने लिए उम्मीद नजर आ रही है। आम आदमी पार्टी पूरे शोध-अध्ययन के बाद किसी राज्य में टांग डालती है।

पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी हँसते-खेलते जीत गई थी। इसकी सबसे बड़ी वजह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी को ले के लोगों में छाया दीवानापन था। काँग्रेस को ले के देश में बेहद आलोकप्रियता का आलम था। काँग्रेस की दशा और खराब दिख रही। बीजेपी-मोदी का जादू पहले जैसा न देश में न ही उत्तराखंड में अब रह गया है। ऐसे में बीजेपी (58 सीटें) के लिए अगले चुनाव में सभी सीटों को बचा पाना शायद ही मुमकिन हो। मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत अगर ऐसा कर पाने में सफल रहते हैं तो ये भी करिश्मा होगा।

खास तौर पर ये देखते हुए कि बीजेपी में अंदरूनी खींचतान बहुत बढ़ चुकी है। त्रिवेन्द्र से नाखुश धड़ा पार्टी में अंदर ही अंदर सक्रिय रहता है। संघ के ओहदेदार अगली बार विधानसभा चुनाव में कितने सक्रिय रहते हैं, ये देखना अहम होगा। चुनाव नतीजे उनकी भूमिका पर भी निर्भर करेंगे। केजरीवाल ये सब देख-सूंघ चुके हैं। उत्तराखंड में धावा बोलने का फैसला इसके बाद ही किया होगा।

`आप’ 7-8 सीटें भी झटक लेती है तो वह बीजेपी का ही नुक्सान अधिक करेगी। काँग्रेस के पास अब और खोने के लिए सीट ही नहीं दिखाई देती है। काँग्रेस तो आज की तारीख में कहीं दौड़ में नजर नहीं आ रही।

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