हरीश का स्मार्ट मूव:जान तभी लगाएंगे जब CM चेहरा घोषित होंगे

इस अंदाज से तो BJP की राह फिर आसान होगी प्रीतम-इंदिरा जी

Chetan Gurung

पार्टी के ओहदेदारों संग बैठक में PCC अध्यक्ष प्रीतम सिंह

काँग्रेस के सामने उत्तराखंड के 16 सालों का सियासी इतिहास है। इसी के भरोसे वह फिर से उस सत्ता को हासिल करने की उम्मीदों में जी रही। जो उससे चार साल पहले बेहद बुरी शिकस्त के साथ छिन गई थी। बजाए खुद को मजबूत-एकजुट करने के, उसके सूबेदार-क्षत्रपों पर क्यों न एक नजर डाली जाए! भाई लोग अभी से CM-CM खेलने लगे हैं। एक-दूसरे पर नेपाम बम बरसाने में जुट गए हैं। उत्तराखंड सियासत का इतिहास देख लें। जब भी पार्टी में ही खूब दे-दनादन हुआ, लोकसभा हो या फिर विधानसभा चुनाव! लुट गई। पिट गई। नेस्तनाबूद हो गई। काँग्रेस इससे सबक नहीं लेना चाहती शायद। तो क्या बीजेपी खुशी से उछलने की सूरत में आ गई है! आज भी उत्तराखंड काँग्रेस के सबसे बड़े नेता-चेहरा हरीश रावत ही हैं। उन्होंने बेहद स्मार्ट मूव इस बार चल दिया है। उन्होंने कह दिया है-CM चेहरा सामने रख के चुनाव में उतरे पार्टी। इस पर उनकी पार्टी में बवाल हो गया है। रावत की मंशा साफ है-एक साल बाद विधानसभा चुनाव हैं। पार्टी के लिए जान तभी लगाएंगे  जब CM से नीचे कुछ न मिलेगा। किसी और का घर रोशन करने के लिए खुद को भला कोई जलाता है!

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हरीश ने अपने लिहाज से अधिक ठीक कहा। बजाए पार्टी के। ऐसा सियासी विश्लेषक मानते हैं। चेहरा घोषित होने से पार्टी में कुछ बड़े चेहरे सिर्फ खुद से वास्ता रखेंगे। ये भी खतरा रहेगा कि चेहरे को ही चुनाव में निबटा डालें। न रहेगा बांस-न बजेगी बांसुरी। पूर्व मुख्यमंत्री और पार्टी के राष्ट्रीय महामंत्री होने के बावजूद रावत की हैसियत को उत्तराखंड में पार्टी के ही लोग बार-बार चुनौती देने से नहीं चूक रहे। इनमें वे भी शामिल हैं जो कभी उनके ही परम शिष्य हुआ करते थे। यूं भी कह सकते हैं कि चप्पल तक उठाने को आतुर रहते थे। छीना-झपटी के मूड में नजर आते थे। शायद उनको लगता है हरीश गुजरा हुआ कल-इतिहास हो चुके हैं। बिना ये सोचे कि आज और आने वाले कल का भविष्य कौन है। जो अभी तक तो दिख नहीं रहा। ऐसी सोच-भाव उत्पन्न हो जाए तो फिर भला कोई क्यों राख़ में भविष्य तलाशेगा!

हरीश को करीब से जानने वाले मानते हैं कि वह न राख़ हैं न खत्म हो चुका दिन। अलबत्ता सियासी जिंदगी की संध्या बेला से गुजर जरूर रहे। इसके बावजूद दो राय नहीं कि आज भी पार्टी में इकलौते जन नेता वही हैं। उनसे अधिक लोकप्रिय और सियासत के खिलाड़ी भी शायद ही कोई है। दो चुनाव एक साथ हार जाने और चुनाव में मिट्टी पलीद होने के बाद इतनी जल्दी शायद ही कोई और नेता उठ के फिर से सियासी रेस कोर्स में दौड़ना शुरू करे। कहाँ तो ये मान लिया गया था कि उत्तराखंड सियासत में उनकी पारी खत्म हो चुकी है। पार्टी उनके नाम पर अब शायद आगे विचार कम से कम उत्तराखंड विशेष की सियासत के लिए न करे। पार्टी के लोग उनके नाम पर मिट्टी डालने लगे थे। हुआ उल्टा। हरीश को राष्ट्रीय महामंत्री बना दिया गया।

इसके बावजूद वह उत्तराखंड की सियासत में खुद को मशगूल रखे हुए हैं। ये सोचना भी मूर्खता होगी कि ये सब वह खुद अपनी मर्जी से कर रहे। बिना हाई कमान की मंजूरी और ईशारे के वह छोटा सा भी डग भरेंगे, ये मुमकिन नहीं है। उन्होंने जो पासा CM चेहरे का फेंका है, उसके पीछे उनकी बहुत सोची-समझी रणनीति देखने की दरकार है। चुनाव से पहले ही वह सारे कील-कांटे निकाल फेंकना चाहेंगे। वह साल 2002 और साल 2012 की पुनरावृत्ति अब उम्र के ढलान पर नहीं चाहते हैं। जब मेहनत उन्होंने की और मलाई खाने एनडी तिवाड़ी-विजय बहुगुणा पैराशूट से कूद पड़े थे। वह जानते हैं कि इस बार विधानसभा चुनाव को एक बार काँग्रेस-एक बार बीजेपी की तर्ज पर सोच के नहीं लड़ा जा सकता है। ये मोदी-शाह की BJP है। जो विधानसभा चुनावों में सबसे बड़ी पार्टी न होने पर भी सरकार बना लेती है। गोवा की मिसाल सबसे बड़ी है।

चार सालों को देख लें। काँग्रेस का ग्राफ बिल्कुल भी नहीं बढ़ा है। न उम्मीद दिखाई दे रही। ऐसे में बीजेपी और त्रिवेन्द्र सत्ता में बने रहने में सफल भी रहते हैं तो अचंभा नहीं होगा। आम आदमी पार्टी अगर उत्तराखंड में जोश और दिमाग ज्यादा लगाएगी तो बीजेपी संग काँग्रेस को भी झटका देगी। काँग्रेस आपसी झगड़ों में उलझी-फंसी और अवाम की नजरों में अगंभीर हो गई है। उसके लिए उत्तराखंड सियासत में इस बार बीजेपी तो अगली बार काँग्रेस की रीत को तोड़ पाना बहुत कठिन लक्ष्य साबित होने वाला है। ऐसी हालत में भला हरीश क्यों खामख्वाह अपनी जान लगाएंगे। पसीना बहाएँगे। किसी और के लिए तख्त का बंदोबस्त करने में। उन लोगों के लिए जो उनको पार्टी के पोस्टर-मंच तक पर जगह देने को राजी नहीं। प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह हो या फिर नेता विरोधी दल इंदिरा हृदयेश, हरीश को देख वे अस्पृश्यता भाव से भर उठते नजर आते हैं। ऐसा उनके मौजूदा तौर-तरीकों-बयानों से लगता है।

अपने खिलाफ पार्टी में चल रहे माहौल पर हरीश खुल के सोशल मीडिया में कुबूल करते हैं। उस पर लिख भी रहे हैं। उत्तराखंड में सत्तारूढ़ पार्टी कभी नहीं जीती है। इसके लिए सत्ता में रहने के दौरान पार्टी में पैदा हो जाने वाला अंतरसंघर्ष और द्वंद्व जिम्मेदार रहा। सभी बड़े नामधारी एक-दूसरे को निबटाने में लगे रहे। सिर्फ इसलिए कि दुबारा सत्ता मिलने पर CM का दावेदार उनके सामने हो ही न। यूं ही बीजेपी के रमेश पोखरियाल निशंक (2002)-बीसी खंडूडी (2012) हार नहीं गए थे। ऐसा नहीं कि उत्तराखंड बीजेपी इससे अछूती है। वहाँ भी खूब चल रहा। त्रिवेन्द्र इंजन को डाउन करने का खेल। त्रिवेन्द्र पर लेकिन मोदी-शाह-संघ तीनों का हाथ है। किसी की क्या मजाल जो इस सबके बावजूद मुख्यमंत्री के खिलाफ चूँ तक सार्वजनिक तौर पर कर दे, जैसा कि काँग्रेस में होता है। जब तक सब कुछ जाहिराना तौर पर कुछ उथल-पुथल दिखाई न दे, आम मतदाता को पार्टी की अंदरूनी सियासत प्रभावित अधिक नहीं करती है।

काँग्रेस के दिग्गजों का अंदाज तो ये साबित कर रहा कि गाँव अभी बसा भी नहीं और बजाए दुश्मन के खुद ही उस पर नेपाम बम गिरा के तबाही का मंजर पैदा करने में जुट गए से हैं। बहरहाल अगले साल होने वाला विधानसभा चुनाव बहुत ही दिलचस्प हो सकते हैं। दोनों प्रमुख दलों और आम आदमी पार्टी के भी उत्तराखंड में कदम रख देने से ये होगा। ये देखना अहम रहेगा कि हरीश की आवाज पर क्या कदम काँग्रेस हाई कमान उठाती है। इस पर उत्तराखंड काँग्रेस में क्या उथल-पुथल आगे मचने वाली है। नजर टिकाए रहिएगा। सस्पेंस-थ्रिलर-रोमांच का लुत्फ मिलने वाला है। ये तय है कि हरीश अगर चुनाव से हाथ खींच लेते हैं तो प्रीतम-हृदयेश काँग्रेस के लिए अगले चुनाव में खुशखबरी हासिल करना बहुत कड़ी चुनौती साबित होगी।  

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