किसी को गुमान नहीं होने दे रहे कि वे ताकत की धुरी हैं  

Chetan Gurung

मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह अचानक ही टॉप गियर में सरकार रूपी अमबेस्डर कार को फेरारी के माफिक दौड़ाते नजर आ रहे हैं। सबसे अहम पहलू जो उनके भीतर नजर आ रहा है, वह नौकरशाही को कसने में जुट गए हैं। किसी को इस बात का गुमान न होने देने की कोशिश कर रहे कि जो वह चाहेंगे वह हो जाएगा। मतलब उनके नाम पर सुपारी लेना किसी के लिए भी बहुत भारी साबित होने वाला है।

आज की तारीख में कुछ नौकरशाह अभी भी बेशक त्रिवेन्द्र की Good Books में है, लेकिन मुख्यमंत्री ने ये छद्म आवरण हटाने की कोशिश शुरू कर दी है कि वह नौकरशाही की किसी खास लॉबी या खास नौकरशाह के असर में हैं। कुछ हालिया तबादला-पोस्टिंग्स में ये उन्होंने झलकाया है। ठेकेदार किस्म के और अपनी ब्रांडिंग करने वाले नौकरशाहों को उन्होंने एक किस्म से न उड़ने का संदेश दिया है। सीएम के एक खासमखास के मुताबिक आज की तारीख में ऐसा कोई शख्स नहीं है, जो मुख्यमंत्री से किसी भी किस्म का उलट-सुलट फैसला करा पाए या किसी भी किस्म की फाइल पर दस्तखत करा सके। 

उत्तराखंड में नौकरशाही बेलगाम होने के आरोप सरकार पर गाहे-बगाहे लगते रहे हैं। इसमें काफी हद तक हकीकत होने से इनकार नहीं किया जा सकता है। इसके बावजूद हाल के महीनों में मुख्यमंत्री ने खुद को काफी हद तक बदला है। साथ ही नौकरशाही को संतुलित करने और काबू में करने की कोशिश की है। ये बात अलग है कि अनेक सीनियर और जूनियर नौकरशाहों में महकमों का बंटवारा खासा असंतुलित माना जा रहा है। कई वरिष्ठ नौकरशाहों के पास कनिष्ठ नौकरशाहों के मुक़ाबले तकरीबन महत्वहीन विभाग हैं। राज्य में नौकरशाही का अलग-अलग खेमों में बंट जाना भी विकास की योजनाओं-फाइलों को लटकाने में अहम भूमिका निभा रहा है।

राज्य की नौकरशाही उत्तराखंड-गैर उत्तराखंड, बिहार बनाम अन्य, मैदान बनाम अन्य, UP-बिहार बनाम दक्षिण भारतीय, महाराष्ट्रीयन, तटस्थ, ब्राह्मण-ठाकुर-दलित-ओबीसी लॉबी में विभाजित दिखाई देती है। ऐसा कभी नहीं हुआ। PCS में भी प्रोमोटी (NT cadre से आए) और Direct सेवा वालों में तलवारें खींची हुई हैं। आज सबसे दबे हुओं में दक्षिण भारतीय आईएएस माने जा रहे हैं। आर मीनाक्षी सुंदरम-सेंथिल पांडियन-मुरुगेशन के पास खास अहम महकमे उनकी वरिष्ठता को देखते हुए नहीं हैं।

इस तरह के हालात कोई अचानक पैदा नहीं हुए। पिछली सरकारों ने भी इन लॉबी को प्रोत्साहन दिया। या फिर इस परिपाटी को खत्म कर्ण की कोई कोशिश नहीं की। त्रिवेन्द्र राज में ये और पल्लवित हुई। इसका नुकसान संपूर्णता में देखें तो IAS कैडर को काफी हुआ। उसकी कैडर पोस्ट में पहले सिर्फ IPS-PCS घुसते थे। बाद में हर कैडर के लोग जुगाड़ लगा के IAS की पोस्ट में घुस आने में सफल रहे। आईएफ़एस (एफ़) अफसर प्रमुख सचिव तो आईएफ़एस (विदेश), IDAS, ITS सचिव भी बने। आज कई IPS अफसर IAS की कैडर पोस्ट पर काबिज हैं। IAS चूँ नहीं कर पा रहे हैं। त्रिवेन्द्र के लिए इस अव्यवस्था को सुव्यवस्थित करना कहीं से भी आसान नहीं होगा।

वह हालांकि IAS-IPS-IFS अफसरों को खुश रखने की कोशिश भी कर रहे। किसी का भी प्रमोशन वह नाहक नहीं रोक रहे। आज आरके सुधांशु और एल फैनई को प्रमुख सचिव पद पर प्रोन्नत कर दिया। प्रभारी सचिव बना के अफसरों को खुश भी कर रहे। IPS में भी जिसका हक बन रहा, उसको उसका वाजिब हक दिया जा रहा है। एक दौर वह भी होता था जब साल भर से ज्यादा गुजर जाने के बावजूद DPC नहीं हुआ करती थीं। IAS अफसर खास तौर पर परेशान रहते थे। त्रिवेन्द्र की ये चाल-रफ्तार बनी रहती है तो उनको सियासी तौर पर भविष्य में लाभ मिल सकता है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here