कारोबार संग जान की परवाह भी जरूरी:निर्माण कार्यों को ले के भी अंगुली

Chetan Gurung  

हरिद्वार कुम्भ का स्वरूप छोटा करना कोरोना के मद्देनजर त्रिवेन्द्र सरकार का ऐसा फैसला है, जो बेहद अहम लेकिन खराब नहीं कहा जा सकता। इससे कारोबार और मुनाफे के नजरिए से भाई उम्मीद पाले बैठे कारोबारियों को बेशक तगड़ा झटका लगा है। इसके बावजूद इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि तमाम इंतजामात और प्रतिबंधों के बावजूद लाखों की भीड़ होने पर सोशल डिस्टेन्सिंग रखना सिर्फ कपोल कल्पना कही जा सकती है। इस बीच ये भी आरोप दबे पाँव सामने आने लगे हैं कि कुछ निर्माण कार्यों में तगड़ा झोल है। इसके चलते कुम्भ प्रशासन भी नहीं चाह रहा था कि मेला लंबा चले।

मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत पर विपक्ष और कारोबारियों के साथ ही साधु-संतों की भी नाराजगी का सामना लघु कुम्भ स्वरूप के चलते करना पड़ सकता है। काँग्रेस ने तो हमला बोल भी दिया है। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने भी इस मसले पर सरकार को आड़े हाथों लिया है। कारोबारी बिफर पड़े हैं कि मेले की अवधि कम क्यों कर दी। उनका रोष समझ में आ सकता है। खास तौर पर उन लोगों का गुस्सा होना स्वाभाविक है, जिन्होंने मेले में कारोबार के लिए 2-3 महीने के हिसाब से तैयारियां की। निवेश किया। अवधि कम होने से उनके मुनाफे और कारोबार पर तगड़ा झटका लगना तय है।

उनको इस बात पर भी ऐतराज है कि सरकार ने RT-PCR टेस्ट कुम्भ आने वालों के लिए जरूरी किया हुआ है। रजिस्ट्रेशन भी पोर्टल पर करना जरूरी किया हुआ है। इसके विरोध में खड़े लोगों की दलील है कि अगर गाँव-छोटे शहरों से आने वालों को पोर्टल जैसी व्यवस्था की जानकारी नहीं होगी या फिर उनके पास इंटरनेट युक्त फोन नहीं होते हैं या फिर नई व्यवस्थाओं से अंजान होंगे तो उनको कुम्भ में प्रवेश करना बहूत मुश्किल भरा साबित होगा। ये सही हो सकता है, लेकिन सरकार के लिए कोरोना के मद्देनजर ये व्यवस्थाएँ कोरोना न फैलने देने के चलते वास्तव में जरूरी कह सकते हैं।

केंद्र सरकार ने मेले को ले के SoP जारी करने में काफी देर की। इसके चलते राज्य सरकार भी जल्दी अपनी SoP जारी नहीं कर पाई। इस देरी को ले के भी सरकार आरोपों के घेरे में है। कुम्भ का स्वरूप छोटा करने के साथ ही राज्य सरकार ने रेल मंत्रालय से स्पेशल रेलें न चलाने और राज्यों से विशेष बसें कुम्भ के लिए न चलाने की गुजारिश की है। ये एहतियात जरूरी हैं। अगर कोरोना ने मेले में एक बार रफ्तार पकड़ ली तो फिर उसको काबू करना सरकार के वश से बाहर हो सकता है। मेले को छोटा करने के फैसले के विरोधी तर्क दे रहे हैं कि यूपी सरकार हर आयोजन भव्य कर रही। विधानसभा-निकाय चुनाव भारी भीड़ में हो रहे।

इसका जवाब ये कहा जा सकता है कि कोई कुएं में जान बूझ के गिरना चाहे तो जरूरी नहीं कि उत्तराखंड सरकार भी उसी राह पर चल पड़े। मेले के आयोजन से जुड़े निर्माण कार्यों को ले के अंगुलियाँ उठने लगी हैं। हालांकि ये सिर्फ आरोप तक सीमित हैं। कोई ठोस प्रमाण सामने नहीं आए हैं। आस्था पथ के निर्माण में भी तकनीकी खामी होने और इसमें बहुत पैसा लग जाने के आरोप उछल रहे हैं। इस किस्म के आरोप वैसे हर मेले में लगते रहे हैं। आज तक किसी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई है।    

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