पल भर का सुकून-चैन नहीं मिल रहा:अधूरे मंत्रिपरिषद से बढ़ा सीएम पर दबाव

Chetan Gurung

मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने अभी तक मंत्रिपरिषद में खाली कुर्सियों को न तो भरा है न ही ऐसा ही कोई संकेत दे रहे कि जल्दी ही वह इस दिशा में कदम उठाने वाले हैं। ऐसे में ये कयासबाजी तेज हो रही है कि क्या उनका इरादा आधी टीम के साथ ही विधानसभा चुनाव को फतह करने का है या फिर अभी भी कोई उम्मीद है।

इसमें कोई शक नहीं है कि अगला विधानसभा चुनाव बहुत कठिन साबित हो सकता है। खास तौर पर ये देखते हुए कि बीजेपी के खिलाफ एंटी इनकमबेनसी काम कर सकती है। जो आज तक हर पूर्व चुनावों में अहम और निर्णायक भूमिका निभाता रहा है। सरकार जितना अच्छा कार्य भी करे और मुख्यमंत्री को ऐन चुनाव से पहले बदले, लेकिन नतीजे हमेशा एक जैसे रहे हैं। यानि सत्तारूढ़ पार्टी की विदाई।

ये ही एक ऐसा पहलू है जो बीजेपी और त्रिवेन्द्र के लिए सबसे बड़ी आशंका है। भले काँग्रेस में न वह आब है न ताब, जिसके बूते उसको सत्ता में वापसी की उम्मीद हो। बीजेपी की एक आशंका अंदरूनी कलह भी है। पार्टी और संघ में कई लंबरदार ऐसे भी हैं जिनको त्रिवेन्द्र भा नहीं रहे। त्रिवेन्द्र पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के साथ ही संघ के दिग्गजों का आशीर्वाद है। इसके चलते ही उनके विरोधियों की दाल नहीं गल रही।

इसके बावजूद खतरा खत्म नहीं हो जाता है। 2012 में बीसी खंडूड़ी को आला कमान का संरक्षण था। वह डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक को चुनाव से 6 महीने पहले हटा के दुबारा सीएम बने थे। पार्टी में उनके विरोधियों ने उनको कोटद्वार की जंग में खेता दिया। जीत जाते तो वही सीएम बनते। तय था। इस एक सीट की शिकस्त से बीजेपी सरकार नहीं बना पाई। काँग्रेस सिर्फ 1 सीट की बढ़त के साथ सरकार बना गई। त्रिवेन्द्र इस मिसाल को याद जरूर रखेंगे।

पिछले चुनाव में मोदी का जादू छाया हुआ था। ये अब भी प्रभावी है लेकिन जादू जैसा नहीं है। खुद पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष बंशीधर भगत कार्यकर्ताओं को चेता चुके हैं। हर बार मोदी नाम के भरोसे मत रहो। मतलब इस बार शायद मोदी का जादू बहुत असरदार नहीं रह सकता है। त्रिवेन्द्र भी हालात को समझ रहे हैं। उनको मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटाने की हवा गाहे-बगाहे चलती रहती है। जो हर बार महज कोरी अफवाह साबित हुई है। अब कुम्भ मेला आ गया है। कोरोना चल ही रहा है। फिर चुनाव से पहले सीएम बदल के बीजेपी हश्र खंडूड़ी के वक्त देख चुकी है। ऐसे में त्रिवेन्द्र की विदाई तो नहीं होनी है लेकिन वह अपने कामकाज की रफ्तार बढ़ा रहे हैं। खुद को हर मोर्चे पर झोंके हुए हैं।

ऐसे में चर्चा सियासी दुनिया में उठनी स्वाभाविक है कि त्रिवेन्द्र क्यों अपनी टीम (मंत्रीपरिषद) को पूरा नहीं कर रहे हैं। टीम पूरी होती तो उनको एक साथ कई राहत मिलती। पार्टी में असंतुष्टों को कम कर सकते थे। अपनी निजी टीम (निष्ठावानों की) मजबूत कर सकते हैं। महकमों को उन्हें सौंप के खुद को काफी हद तक हल्का कर चुनावी अभियानों के लिए अधिक उपलब्ध कर सकते थे। कामकाज के तनाव और बोझ से भी मुक्त होते। अभी उनके पास 50 से अधिक अहम महकमे हैं। उनकी फाइलों को देखेंगे तो चुनावी दौरे नहीं हो पाएंगे। दौरे करेंगे तो फाइलें नहीं हो पाएँगी।

त्रिवेन्द्र ने ये कभी नहीं कहा है कि वह मंत्रीपरिषद में खाली (3) सीटों को नहीं भरेंगे। कयास ये ही लगाए जाते रहे हैं कि हाई कमान की अंतिम मंजूरी न मिलने के कारण ही विस्तार नहीं हो पा रहा है। उम्मीद ये भी थी कि राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) धन सिंह रावत शायद मंत्रिमंडल में लाए जाएँ। ये भी नहीं हो पा रहा है। धन सिंह को कुशल रणनीतिज्ञ माना जाता है। मोदी-शाह-संघ के करीबियों में उनको भी शुमार किया जाता है। चुनाव के लिए भले एक साल रह गए हैं लेकिन अभी भी पार्टी में ऐसे विधायकों की भरमार है, जो मंत्री बनने को एकदम तैयार हैं।   

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