जम के नदी-नालों को पाट के प्लॉटिंग:न पुलिस कुछ देखती न तहसील को कोई मतलब

सारे बाग-बागीचे साफ:किराएदारों के लिए बन रहे मकान:न पोर्च-न गैराज

Chetan Gurung

नदी-नालों पर अवैध कब्जों के साथ ही उनको पाट के प्लॉटिंग किए जाने को एक बार फिर नैनीताल हाई कोर्ट ने न सिर्फ अवैध-गैर कानूनी माना है, बल्कि इस मामले में देहरादून के DM और MDDA को आड़े हाथों लिया। सवाल और मुद्दा ये भी है कि क्या हाई कोर्ट के आदेश मानने के लिए सेना की नियंत्रण वाले कैंट बोर्ड बाध्य नहीं हैं या फिर उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता? राजधानी के डाकरा-गढ़ी कैंट में न सिर्फ अवैध कब्जों का बाजार गरम है बल्कि खाली पड़ी जमीन को Non ZA बता के बिना किसी दस्तावेजों के या फिर फर्जी कागजों के सहारे धड़ल्ले से कब्जे हो रहे हैं। नदी-नालों को पाट के उनकी अवैध प्लॉटिंग खुल के हो रही। बाग-बागीचों को साफ कर उन पर मकान-अपार्टमेंट-शॉपिंग कॉम्प्लेक्स खड़े किए जा रहे हैं। कैंट बोर्ड-पुलिस के साथ ही तहसील की मिली भगत और लापरवाही को इसके लिए दोषी ठहराया जा सकता है।

ये बोर्ड लगा ही रह गया पर संजय विहार में नालों में अवैध कब्जा खूब चल रहा

डाकरा में संजय विहार कॉलोनी के चारों तरफ नाले हैं। खुद कैंट बोर्ड के अध्यक्ष सब एरिया कमांडर ने बोर्ड लगाया हुआ है कि बोर्ड की दोनों दिशा में 30-30 फिट की दूरी पर कोई निर्माण नहीं होगा। आज सिर्फ ये बोर्ड लावारिस की तरह रह गया है। जिस जगह बोर्ड है उसको भी कब्जे में माफिया ले चुके हैं। ये नाला है। यहाँ बरसात के दिनों में पूरा नाला बहता था। कॉलोनी के चारों तरफ ये नाला है। माफिया तत्वों ने नालों को इस कदर पाट डाला है कि अब सिर्फ 400 गज के करीब छोटा सा टुकड़ा बचा रह गया है। इस टुकड़े पर कब्जे के लिए भी तमाम लोग बार-बार आते हैं कि उन्होंने इसको खरीद लिया है। स्थानीय कॉलोनी वाले जब इकट्ठा हो के उनसे दाखिल खारिज-रजिस्ट्री मांगते हैं तो वे फिर पलट के नहीं आते।

वे ये तर्क जरूर देते हैं कि जमीन Non ZA है इसलिए दाखिल खारिज नहीं होता है। कई बार पुलिस और कैंट बोर्ड के लोग भी कॉलोनी वाले बुला चुके हैं। पुलिस का हाल ये है कि एक बार इस पर SIT जांच भी बिठाई गई थी। SIT को संजय विहार और टपकेश्वर कॉलोनी में मंदिर से पहले नाले को पाट के अवैध प्लॉटिंग की जांच खुद आज के DGP अशोक कुमार ने सौंपी थी। SIT रिपोर्ट ने संजय विहार का जिक्र रिपोर्ट में किया ही नहीं। टपकेश्वर में नालों को पाट के और अवैध खनन कर प्लॉटिंग पर रिपोर्ट दी कि ये खुद भू स्वामी कर रहा है। ये जिक्र नहीं किया कि खुद सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि नदी-नाले-खाले-पोखर-तालाब को पाट के, उनका रुख मोड़ के या किसी भी अन्य तरीके से उनका इस्तेमाल अवैध होगा। चाहे नाले-नदी सूखी हो या बंजर हो।

टपकेश्वर में तो कुछ महीने पहले इस अवैध प्लॉटिंग को ले के दो पक्षों में जम के झगड़ा भी हुआ। खनन अभी भी हो रहा। गोर्खाली सुधार सभा के सामने, डाकरा में महेंद्र बाग, गढ़ी में दो घराटों के बीच विशाल बागीचा प्लॉटिंग की भेंट चढ़ चुका है। कैंट बोर्ड के जिम्मे नक्शा पास करना और अवैध कब्जों-निर्माण को रोकना है। नक्शे पास करते समय वह कुछ परीक्षण भी करती है, ऐसा लगता नहीं। आलम ये है कि कोई भी शख्स किसी की भी और किसी भी किस्म की जमीन पर नक्शा पास करा सकता है। वह न जमीन की प्रकृति को देखता है न ही हरियाली को बचाने की ही कोशिश करता दिखता है। तहसील ये कह के हाथ खड़े कर देता है कि जिन ज़मीनों पर कब्जे हो रहे, उनका राज्य सरकार से कोई वास्ता नहीं।

कैंट बोर्ड की नाकामी का आलम है कि डाकरा-गढ़ी में मुख्य बाजार सड़कों पर इस कदर अवैध अतिक्रमण है कि लोगों के लिए अब पैदल चलना तक मुहाल हो गया है। बाज़ारों से ले के गलियों तक में लोगों की कारें स्थायी रूप से पार्क हो रही। पुलिस भी कुछ नहीं कर रही। डाकरा-गढ़ी में तकरीबन हर घर में कई-कई किरायेदार रखे गए हैं। मकानों का खुल के व्यावसायिक इस्तेमाल हो रहा है। इसके चलते बिजली-पानी की कमी का संकट भी लोग झेल रहे। किराएदारों के पास भी गाड़ियाँ होने के कारण कॉलोनियों का भी बुरा हाल हो गया है। सभी अपनी गाड़ी सड़क पर खड़ी कर रहे। मकान मालिक पोर्च या गैराज बनाने के बजाए कमरे बना के किराये पर चढ़ाने और पैसा कमाने में दिलचस्पी ले रहे। कैंट बोर्ड इस दिशा में हाथ पर हाथ बांधे बैठा दिखता है। किराएदारों को रखने या फिर पार्किंग को ले के कोई नीति उसके पास दिख नहीं रही। हाई कोर्ट के ताजे आदेश के बाद एक बार फिर ये साफ हो गया है कि कैंट बोर्ड के नियंत्रण वाले इलाकों में अवैध निर्माण और भूमि कब्जों के साथ ही नदी-नालों को पाट के प्लॉटिंग करना पूरी तरह गैर कानूनी और कानून का मखौल है। पुलिस-कैंट बोर्ड-तहसील-जिला प्रशासन इस तरफ अब कोई कदम उठाएगी या फिर पूर्व की तरह ही आँखें बंद कर माफिया तत्वों का साथ देगी, इस पर

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