मुद्दा गरम::लोक प्रतिनिधित्व एक्ट-1951 का Section 151-A सिरदर्द! तीरथ के लिए इसका तोड़ निकालेगी BJP!

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एक साल से कम अवधि के चलते CM के सामने बने रहने का संकट! अध्यादेश लाएगी मोदी सरकार!

चुनाव आयोग-केंद्र सहमति से उपचुनाव पर निकाल सकता रास्ता:मंत्री सुबोध उनियाल

Chetan Gurung

ये धारा CM तीरथ सिंह रावत और BJP के लिए सिरदर्द साबित हो सकती है

CM तीरथ सिंह रावत को विधानसभा का सदस्य बनाने के लिए उपचुनाव जीतना है, लेकिन लोक प्रतिनिधित्व Act-1951 के Section-151-A उनके और BJP के लिए सिरदर्द साबित हो सकता है। इसमें उल्लेख है कि विधानसभा का कार्यकाल एक साल से कम हो तो फिर उपचुनाव नहीं होंगे। अगर ऐसा हुआ तो फिर उत्तराखंड की सियासत में फिर खलबली मच सकती है। तीरथ अगर बचे पौन तीन महीने के भीतर विधानसभा के सदस्य नहीं बनते हैं तो फिर कायदे से उनको कुर्सी छोड़नी पड़ सकती है। इस मामले में विशेषज्ञों या विद्वानों की राय बेहद जटिल है, लेकिन सरकार के प्रवक्ता और मंत्री सुबोध उनियाल का दावा है कि कुछ प्रावधान हैं, जिसके सहारे मुख्यमंत्री के उपचुनाव में कहीं कोई दिक्कत नहीं आएगी।

धारा में व्यवस्था है कि खाली किसी भी सीट को छह महीने के भीतर भरा जाएगा। इसमें दो बिन्दुओं का साफ उल्लेख है। जिसके मुताबिक उपचुनाव नहीं कराए जा सकते हैं। ये परिस्थितियां इस प्रकार हैं-

1-रिक्ति से संबन्धित सदस्य का कार्यकाल एक साल से कम है।

2-केंद्र सरकार से विचार-विमर्श कर चुनाव आयोग ये साबित कर दे कि संबन्धित अवधि में उपचुनाव कराना कठिन है।

यहाँ कठिन का मतलब जम्मू-कश्मीर जैसे आतंकवाद से ग्रस्त राज्य में उपचुनाव कराने से है। या फिर कोई बेहद प्रतिकूल परिस्थिति सामने हो। मसलन महीनों तक इतनी बर्फ पड़ जाए कि संबन्धित निर्वाचन क्षेत्र तक पहुँचना भी मुमकिन न हो। उत्तराखंड में दोनों ही किस्म के हालात नहीं हैं। यहाँ न आतंकवाद जैसा मसला है न ही मौसम के कारण किसी भी क्षेत्र के हालात ऐसे नहीं हैं कि उपचुनाव न कराए जा सके।

जो लोग कोरोना को उपचुनाव न करा पाने का आधार बनाने का तर्क दे रहे, उनको याद रखना होगा कि पश्चिम बंगाल-असम-बिहार तथा कई अन्य राज्यों में जब विधानसभा चुनाव हुए थे तो हालात इससे बदतर थे। उत्तराखंड में अब कोरोना तकरीबन काबू में हैं। पूर्व आला नौकरशाहों-पूर्व न्यायाधीशों-संविधान-धाराओं के ज्ञाताओं-विद्वानों से `Newsspace’ने बात की।

तकरीबन सभी ये मान के चल रहे हैं कि धारा `151-A में किसी किस्म की राहत या छूट उपचुनाव न कराने की नहीं है’। यहाँ मामला और अहम इसलिए है कि उपचुनाव महज किसी को विधायक चुनने भर के लिए नहीं होना है। यहाँ CM की कुर्सी और तीरथ का सियासी भविष्य दांव पर है। सरकारी प्रवक्ता और मंत्री सुबोध उनियाल के अनुसार `ठीक है कि 1 साल से कम समय होने पर उपचुनाव न कराने का प्रतिबंध है लेकिन ये भी प्रावधान है कि केंद्र सरकार-चुनाव आयोग आपस में बातचीत कर उपचुनाव टाल भी सकते हैं’। सुबोध का ईशारा परोक्ष तौर पर इस ओर है कि जब आयोग ही उपचुनाव नहीं कराएगा तो CM के लिए उपचुनाव जीतने की बाध्यता नहीं होगी। हालांकि उन्होंने इस बाबत साफ कुछ नहीं कहा।

बीजेपी के ही विधायक मुन्ना सिंह चौहान भी विधायी-नीतिगत मामलों के विद्वान माने जाते हैं। वह भी इस मुद्दे पर पूछे जाने के दौरान कुछ भी साफ नहीं बोल पाए कि आखिर तीरथ को उपचुनाव लड़ने के लिए बाध्य होना पड़ेगा कि नहीं। एक पूर्व मुख्य सचिव और एक पूर्व प्रमुख सचिव ने कहा कि उन्होंने सारी धाराएँ पढ़ लीं पर कहीं भी किसी किस्म की राहत ऐसे मामलों में किसी को देने का प्रावधान नहीं दिखाई दिया है। केंद्र सरकार-चुनाव आयोग और BJP मिल के इस बारे में क्या कदम उठाती है और क्या हल निकालती है, इसको देखना दिलचस्प होगा।

High Court के एक Ex Justice ने `Newsspace’ से बातचीत में कहा, `ये धारा तो साफ है कि 6 महीने के भीतर खाली सीट को भरना होगा लेकिन अगर कोई CM है और कार्यकाल एक साल से कम होने की दशा में उनका क्या होगा, ये जिक्र नहीं है’। संविधान के मुताबिक CM तो कोई भी बन सकता है लेकिन उसको छह महीने के भीतर विधायक बनना ही होगा। तीरथ के मामले में मोदी-शाह की जोड़ी और BJP आला कमान ने कुछ न कुछ तो जरूर सोचा होगा। इसका हल भी जरूर निकाला होगा। ऐसा मानने वाले भी हैं।

उनका तर्क है-जो बात-पहलू सभी के दिमाग में है, वह मोदी-शाह-BJP के ध्यान में नहीं होगा, ऐसा संभव नहीं लगता। एक चर्चा ये भी चल रही कि क्या तीरथ को CM बनाए रखने के लिए मोदी सरकार कोई अध्यादेश ला सकती है? हालांकि इतना बड़ा फैसला वह करेगी, इसको ले के भी अलग-अलग राय है। किसी को लगता है कि मोदी सरकार के लिए ऐसे अहम फैसले करना चुटकी बजाने से बड़ा काम नहीं। वह जम्मू-कश्मीर से धारा-370 हटा चुकी है। GST लागू करने में नहीं हिचकी। नोटबंदी जैसा बड़ा कदम भी उठाया।

ऐसा भी मानने वाले हैं कि उत्तराखंड सरीखे छोटे से राज्य के लिए अध्यादेश लाने जैसा कदम उठा के विरोध-आलोचना झेलना मोदी-शाह-उनकी पार्टी शायद पसंद न करें। बहरहाल तीरथ को ले के चर्चें तो शुरू हो ही गए हैं, नतीजा जो भी निकले।

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