Big Issue::उत्तराखंड में फिर भगवा फहरा पाएगी RSS!

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पार्टी में दरारों से बढ़ी सत्ता कायम रखने की चुनौती:बुद्धिजीवियों-पूर्व नौकरशाहों को जोड़ने की कोशिश

Chetan Gurung T

CM Tirath Singh Rawat

विधानसभा चुनाव सिर पर हैं लेकिन उत्तराखंड BJP में उत्पन्न और फैलती दरारों ने इस बार RSS के लिए हालात बहुत मुश्किल और चुनौतीपूर्ण कर दिया है। पार्टी को सत्ता में बनाए रखने के लिए वह बुद्धिजीवियों और पूर्व नौकरशाहों को किसी न किसी तरह अपने संग जोड़ने की कोशिशों में जुटी हुई है। फिर भी ये साफ है कि संघ के लिए पार्टी के अंदरूनी हालात और PM नरेंद्र मोदी के धुँधलाते तिलिस्म-जादू के चलते अपनी सियासी शाखा को फिर से सत्ता में बनाए रखना इस बार किसी भी तरह आसान नहीं।

RSS खुद को भले गैर राजनीतिक बताता है लेकिन ये कोई छुपी बात नहीं कि BJP को केंद्र और राज्यों में सत्ता में लाने या बहाली बनाए रखने में उसकी भूमिका खामोश लेकिन बेहद अहम रहती है। उत्तराखंड में त्रिवेन्द्रराज के दौरान संघ को वह तवज्जो नहीं मिलती थी, जो मौजूदा तीरथराज में मिल रही। CM रहने के दौरान त्रिवेन्द्र ज़्यादातर फैसले अपने विवेक और पार्टी के दिग्गजों की राय से लेना पसंद करते थे। आँख मूँद के संघ की राय को शिरोधार्य मानना या फिर उसके हुक्म का गुलाम बनना उन्होंने कभी स्वीकार नहीं किया। इसके चलते संघ के साथ उनकी तनातनी अंदरखाने खूब रही।

त्रिवेन्द्र की CM कुर्सी से विदाई में कई अन्य कारणों के साथ ही संघ की भी अहम भूमिका रही। त्रिवेन्द्र खुद संघ में लंबे समय तक रहे थे इसलिए वह संघ के लोगों की हैसियत और कार्यशैली से भली-भांति वाकिफ थे। संघ के अधिकारियों को तीरथराज में सत्ता के गलियारों में देखा जा सकता है। पहले वे सब गायब से थे। इसके बावजूद संघ की मजबूरी कही जा सकती है कि वह त्रिवेन्द्रराज के दौरान ही BJP को फिर से सत्ता में लाने की मुहिम में जुट गई थी। त्रिवेन्द्र के CM रहते ही संघ प्रमुख मोहन भागवत देहरादून प्रवास पर थे तो उन्होंने तब 5 ऐसे नौकरशाहों संग गोपनीय लेकिन सामूहिक बैठक की थी, जो मुख्य सचिव रह चुके थे।

`Newsspace’ से बातचीत में इन नौकरशाहों ने माना कि वे भागवत से मिले थे लेकिन इस बात से इनकार किया कि उनको संघ से जुड़ने या BJP में आने की कोई पेशकश उस बैठक में की गई थी। इनमें से एक ने जरूर स्वीकार किया कि उनको राम मंदिर निर्माण से जुड़ी जिम्मेदारियों का वहन करने के लिए प्रांत के एक अहम ओहदेदार की तरफ से पेशकश मिली थी। जिसको उन्होंने विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया था। शासन के सचिव स्तर के कुछ अफसरों ने भी इस बात की पुष्टि की कि उनको संघ के लोग फोन और व्हाट्स एप करने लगे हैं। जो किसी न किसी काम के सिलसिले में ही होता है।

तीरथ के आने के बाद संघ अधिक सक्रिय दिख रहा। संघ का दबदबा सरकार में हो रही नियुक्तियों में भी झलक रहा। CM के मुख्य सलाहकार और मुख्य सचिव रहे शत्रुघ्न सिंह हो या फिर HoFF से रिटायर सलाहकार RBS Rawat, संघ के करीबी माने जाते हैं। एक सलाहकार और नियुक्त किए गए थे। इसमें भी संघ की ही अहम भूमिका थी। ये बात दीगर है कि पार्टी में ही असंतोष भड़क जाने के कारण उसकी नियुक्ति तत्काल रद्द करनी पड़ी। संघ का संघर्ष BJP और सत्ता में अहम पदों पर बैठे बड़े नामों में सड़क स्तर की आपसी खींचतान-बयानबाजियों ने कठिन कर दिया है।

ये कम हैरानी की बात नहीं कि न पार्टी नेतृत्व न ही संघ उन पर अंकुश लगा पा रहा है। तीरथ-त्रिवेन्द्र में कुम्भ में कोरोना फर्जी टेस्टिंग मामले को ले के खंजरबाजी सरीखी चल रही। त्रिवेन्द्र मंत्रिमंडल में रह चुके और अभी भी मंत्री हरक सिंह रावत-सुबोध उनियाल खुल के तीरथ के फैसलों का बचाव करते समय पूर्व सीएम की धज्जियां बिखेरने में नहीं चूक रहे। मंत्री गणेश जोशी भी खुल के त्रिवेन्द्र के खिलाफ नजर आ रहे। उनकी और उमेश शर्मा काऊ की सार्वजनिक गरमा-गर्मी हो या फिर उधम सिंह नगर में मंत्री सतपाल महाराज का SSP पर अवैध खनन को ले के बरसना, सब BJP के लिए विधानसभा चुनाव में शूल साबित हो सकता है।

तीरथ के लिए हालात बहुत ही नाजुक हैं। CM की कुर्सी उनके लिए काँटों भरा ताज साबित हो रही। सत्ता संभालते ही पहले तो कुम्भ और कोरोना ने उनका हलक सुखाए रखा। अब पार्टी में आपसी लट्ठम-लट्ठा उनको सुकून के दो पल गुजारने और आगे की ठोस चुनावी रणनीति तय करने नहीं दे रही। अभी ये भी साफ नहीं है कि वह CM बने रहने के लिए किस विधानसभा सीट से लड़ेंगे। ये भी बहुत बड़ा मुद्दा बना हुआ है कि वह कायदे से तो उपचुनाव लड़ भी नहीं सकते। BJP और सरकार की तरफ से अलबत्ता ये जरूर दावा किया जा रहा कि तीरथ के उपचुचुनाव लड़ने में कहीं कोई दिक्कत नहीं है।

संघ-बीजेपी-तीरथ की चुनावी चुनौती दो कारणों से बेहद कठिन दिखती है। एक तो कोई भी पार्टी सत्ता में रहते आम चुनाव नहीं जीती है। ये उत्तराखंड के 21 साल का इतिहास है। कोश्यारी-ND Tiwari-BC Khanduri-हरीश रावत CM रहते पार्टी को आम चुनाव नहीं जितवा पाए। तीरथ ऐसा कर पाते हैं तो ये उनकी ऐतिहासिक सफलता होगी। जब से मोदी PM बने हैं, BJP विधानसभा चुनावों में भी उनका ही चेहरा आगे कर के लड़ती रही है। अधिकांश में उसको बड़ी कामयाबियाँ मिली भी। अब तस्वीर बदली हुई दिखाई देती है।

हालिया पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में पूरी ताकत झोंक दिए जाने और मोदी के वहीं डेरा डाल दिए जाने के बावजूद BJP की जबर्दस्त शिकस्त और उससे पहले बिहार में भी पार्टी को मिली नाकामी ने Brand मोदी को हल्का कर डाला है। उत्तराखंड बीजेपी के अध्यक्ष रहने के दौरान बंशीधर भगत की जुबान पर ये बात आ भी गई थी। उन्होंने कार्यकर्ताओं से मोदी के भरोसे चुनाव जीतने की उम्मीद छोड़ खुद मेहनत करने को कहा था। भगत अब तीरथ सरकार में मंत्री हैं। ऐसे हालात में BJP-RSS-Tirath की तिकड़ी सत्ता पर काबिज बने रहने के लिए क्या नई और ठोस रणनीति अपनाती है, ये शायद 2-3 महीनों के भीतर दिखने लगेगा।    

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