ताप (बुखार) में `प्रताप’::HC में तीरथ सरकार को कदम-कदम पर ठोकर खिला रही नौकरशाही

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4 धाम यात्रा भी रोक दी गई:घोड़ा ठीक नहीं या Jockey!

विधानसभा चुनाव में तीरथ-BJP के लिए संकट न बन जाए ये आलम

बुरी मुद्रा-अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर चुकी है सरकार:लगाम लगाएँ  

The Corner View

Chetan Gurung

आखिर उत्तराखंड में सरकार और नौकरशाही को क्या हो गया है? क्यों वह इस कदर नैनीताल HC में बार-बार अपने कदमों-फैसलों को ले के लज्जित होने और फटकार खाने को मजबूर हो रहा? ऐसा तो मुमकिन नहीं कि राज्य में काबिल नौकरशाहों की कमी है। ये भी नहीं है कि उत्तराखंड Cadre के IAS-IPS अफसर प्रशासन चलाने लायक नहीं। फिर क्यों कदम-कदम पर नैनीताल HC में सरकार को अपने फैसलों को ले के बैक फुट पर आना पड़ रहा? या फिर अदालत में एक टांग पर हाथ जोड़े-सिर झुकाए खड़े होने के लिए मजबूर होना पड़ रहा। तीरथ की अगुवाई वाली BJP सरकार शायद इसकी सियासी गंभीरता को अभी समझ नहीं रही।  उसको अंदाज होना चाहिए कि चंद महीनों बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में ये ही सब प्रमुख मुद्दे बन जाएंगे। फिर उसके सिर पर बेताल की तरह सवार हो के अबूझ से सवाल पूछने लग जाएंगे। नौकरशाही अगर सरकार को ठोकरें खिला रही तो इसके लिए सियासी Boss भी कहीं से खुद को बेक़ुसूर बता के किनाराकशी नहीं कर सकते हैं। चुनाव में जनता जनार्द्धन के सवालों के जवाब नौकरशाहों को नहीं उनको ही देना है। 1 जुलाई से शुरू हो रहे चार धाम यात्रा पर जिस तेवर और गुस्से के प्रदर्शन के साथ रोक लगाई, उससे सरकार की प्रतिष्ठा पर आंच आनी ही है।   

Chetan Gurung

हाल ये है कि नैनीताल HC लगभग हर मामले में सरकार और नौकरशाहों की जबर्दस्त स्कैनिंग-स्क्रीनिंग-पोस्ट मार्टम कर रहा। इसके बाद उन पर तीखी टिप्पणी करने को मजबूर भी हो रहा। पहले त्रिवेन्द्र सरकार और अब तीरथ सरकार इंसाफ की देहरी पर अपमान का ये सिलसिला तोड़ने में नाकाम साबित हो रही। चार धाम यात्रा को एक किस्म से जल्दबाज़ी में और अधूरी तैयारियों के साथ शुरू करने का फैसला करार देते हुए HC ने इस पर कल रोक लगा दी। तीरथ सरकार को आज सुबह-सुबह ही संशोधित कोरोना Guide Lines पेश कर हुक्म की तामील करने को मजबूर होना पड़ा। इसमें चार धाम यात्रा को स्थगित करने का फैसला शामिल किया गया है। ऐसा लग रहा कि सियासती नेतृत्व अपरिपक्व-अनुभव की कमी से जूझ रहा। नौकरशाही भारी दबाव-लापरवाही की मारी लग रही।

नौकरशाही और PM नरेंद्र मोदी की भाषा के मुताबिक सिस्टम का ये ही आलम रहा तो विधानसभा चुनाव में BJP के लिए उत्तराखंड का चुनावी समर फतह करना कुरुक्षेत्र का युद्ध जीतने जैसा दुरूह ही नहीं कुछ-कुछ नामुमकिन सा भी साबित हो सकता है। यूं भी उत्तराखंड के दो दशकों का चुनावी रेकॉर्ड तोड़ने वाली पार्टी अभी तक कोई नहीं साबित हुई है। कोई भी पार्टी सत्ता में रहते हुए आम चुनाव जीतने का करिश्मा नहीं कर पाई है। तीरथ ऐसा कर जाते हैं तो इतिहास पुरुष बन जाएंगे। यहाँ की अवाम जल्दी ही सत्तारूढ़ पार्टी-क्षेत्रीय विधायक से ऊब जाती है। दोनों से उम्मीद खो देना भी एक और वजह मानी जाती है। इसके पीछे भी नौकरशाही ही पर्दे के पीछे प्रमुख रूप से जिम्मेदार रही। तममा बड़े-बड़े घोटालों को नौकरशाहों ने ही अंजाम दिया। चंदेक को छोड़ दें तो किसी का बाल तक बांका नहीं हुआ। मौजूदा सरकार में भी ऐसे नौकरशाहों की भरमार है। सभी मलाईदार कुर्सियों पर हैं।   

नौकरशाही सरकार की नीतियाँ तैयार करती हैं। उनका अनुपालन कराती है। भले सरकार चलाने का श्रेय राज्य में CM और मंत्रिमंडल ले। हर साल करोड़ों में से छंट के देश चलाने के लिए चुने जाने वाले चंद बेहद विवेकशील-बुद्धिमान-त्वरित फैसले लेने में माहिर समझे जाने वाले IAS अफसरों की जमात पिछले कुछ अरसे से उत्तराखंड सरकार को हर डगर पर धड़ाम से गिरने और प्रतिष्ठा को चोटिल होने से बचा पाने में नाकाम साबित हुई है। बल्कि इसके लिए जिम्मेदार काही जा सकती है। ऐसा लग रहा मानो वे किसी भारी किस्म के दबाव में काम करने के चलते अपनी काबिलियत का इस्तेमाल कर ही नहीं पा रहे। या फिर सरकार के लिए उनके मन में `चलता है-अपना क्या जाता है’ वाली भावना घर कर गई है। HC कोई यूं ही सरकार फैसलों पर रोक लगा या फिर नाराजगी-असंतोष नहीं जता रही। इसके पीछे सरकार के खराब या फिर अधूरी तैयारियों वाले फैसले-शपथ पत्र-जवाब जिम्मेदार रहे हैं। इनको सचिव और उनके ऊपर के बॉस ही तैयार करते हैं।   

कुम्भ मेले के आयोजन-RT-PCR टेस्ट रिपोर्ट को ले के HC पहले ही बहुत आक्रामक और तल्ख टिप्पणी कर चुका है। जो भी छोटे-बड़े मसले HC पहुँच रहे, सरकार को निराशा-हताशा-नाकामी का मुंह ही देखना पड़ रहा। CS-सचिवों की बार-बार अदालत में पेशी अब शगल बन चुका लगता है। ऐसे केसों की लंबी फेहरिस्त है, जिसमें सरकार को जबर्दस्त मुंह की खानी पड़ी है। चार धाम यात्रा को ले के HC का सख्त रुख इसलिए भी समझ में आता है कि कुम्भ के आयोजन में हुई भीषण गल्तियाँ-घोटाले लोगों की जान का सौदा बन गए। आज पूरी दुनिया के साथ अब देश की गोदी मीडिया तक भी स्वीकार कर चुकी है कि कुम्भ के कारण कोरोना न सिर्फ फैला बल्कि हजारों के प्राण भी हर गया। HC ने कोरोना के कारण ही काँवड़ यात्रा भी रोकी है।

HC ने नौकरशाही को आड़े हाथों लेने के साथ ही ये भी कहा कि उसने ही कैबिनेट को चार धाम यात्रा को ले के पूरी रिपोर्ट नहीं दी। उच्च न्यायालय ने ये टिप्पणी इसलिए की कि कैबिनेट ने ही चार धाम यात्रा को मंजूरी दी थी। इस टिप्पणी से मंत्रिमंडल की क्षमताओं पर भी अंगुली उठती है। क्या मंत्री नौकरशाहों की तरफ से पेश प्रस्तावों को बिना ढंग से पढ़े-समझे हाँ में हाँ मिला देते हैं? नौकरशाही को करीब से समझने वाले या फिर पूर्व नौकरशाहों के मुताबिक सरकार को जिस तरह बार-बार HC के सामने झुकना पड़ रहा, उसके लिए खुद दोषी है। नौकरशाह तो रेस के घोड़े की तरह होते हैं। अगर जॉकी (घुड़सवार) अच्छा होगा तो वह शानदार दौड़ेंगे-जितवा देंगे। अनाड़ी सवार को तो धड़ाम से जमीन पर गिरा भी देते हैं। बिला शक कहा जा सकता है कि उत्तराखंड में सबसे बेहतर सरकार ND Tiwari ने चलाई। उन्होंने भ्रष्टाचार में घिरे नौकरशाहों पर Action की बिजली भी खूब गिराई। उत्तराखंड में हर किस्म के IAS-IPS-IFS-PCS-PPS अफसर हैं। ये सरकार पर निर्भर करता है कि वह सभी की प्रतिभा-काबिलियत को परखें। फिर उनसे उनकी प्रतिभा-क्षमता के मुताबिक कार्य लें।

दिक्कत ये है कि सरकार में ही ये सोचने-समझने-फैसले लेने की क्षमता नहीं दिख रही। वह गलत नौकरशाहों पर दांव खेलती दिख रही। जो गल्तियाँ त्रिवेन्द्र सरकार ने नौकरशाहों को ले के की, तीरथ सरकार उसी पर आगे बढ़ रही। त्रिवेन्द्र के राज में चंद को छोड़ बाकी नौकरशाहों और मंत्रियों तक में मनमानी या फिर सरकार को अंधेरे में रखने का हौसला नहीं होता था। मंत्रियों तक को साँप सूंघे रहता था। आज हर मंत्री खुद को CM से कम नहीं समझ रहे। नौकरशाह खुद को सुल्तान समझ के खुद का सिक्का चला रहे। दोनों के करण सरकार का `प्रताप’ हिल चुका दिख रहा। जो पहले Blind चाल खेलने से भी हिचकते थे, वे अब बेफिक्री से Counter मारने में भी नहीं हिचक रहे। मुख्यमंत्री तीरथ शरीफ हैं और सादगी पसंद हैं, कोई शक नहीं। हकीकत लेकिन ये है कि शराफत छोड़ चाबुक चलाने वाले ही सल्तनत बढ़िया चलाते रहे हैं। इतिहास उनको-उनकी हुकूमत को याद करता रहा है।

इतिहास पसंद न हो तो PM नरेंद्र मोदी को देख लें। उनकी लोकप्रियता को देखें। कितने लोग देश-दुनिया में उनको जानते हैं। सुर्खियां बटोरते हैं। कितने लोग पूर्व में PM रहे मोरारजी भाई देसाई-इंद्र कुमार गुजराल-हरधनहल्ली डोड्डेगौड़ा देवेगौड़ा को जानते हैं। तीरथ के पास विकल्प है। मोदी बनना है या मोरारजी-गुजराल-देवेगौड़ा! फैसला उनके हाथ में है। लोकप्रिय लेकिन आजमाया हुआ जुमला है-सरकार तो अपने `प्रताप’ से चला करती है। वरना हर गली-मुहल्ले में चोर-बदमाश-भ्रष्टाचारी को पकड़ने के लिए सिपाही थोड़ी रख सकते हैं। ये `प्रताप’ कायम करना तीरथ सरकार की सबसे बड़ी जरूरत है। अच्छे-बुरे नौकरशाहों की जल्द अच्छी-बुरी वाली श्रेणी बना के काम लेना होगा। उनको टास्क देने होंगे। याद रखना होगा कि बुरी मुद्रा-अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है। कैसे-कैसे नौकरशाह (बुरी मुद्रा) क्या-क्या मौज कर रहे और कैसे-कैसे नौकरशाह (अच्छी मुद्रा) बेकाम टकटकी बांध के अपने दफ्तर के दरवाजे देखते हैं कि कोई फाइल-काम आ जाए। उनकी पहचान बहुत जरूरी है।     

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