PCC अध्यक्ष की जंग::प्रीतम के सूर्यकांत-हरीश के गणेश! भिड़ उठे Congress के दोनों `सरदार’

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LoP का चयन तो महज बहाना है:विधानसभा चुनाव में अपनों को ज्यादा से ज्यादा टिकट दिलाना मकसद

ब्राह्मण-ठाकुर समीकरण बिठाने में छूट रहा आला कमान का पसीना

Chetan Gurung

सूर्यकांत धस्माना (प्रीतम सिंह के वफादार सिपहसालार हैं और PCC अध्यक्ष बनने की होड़ में आ गए हैं)

Leader Of The Opposition (LoP) इंदिरा हृदयेश के आकस्मिक निधन के चलते PCC अध्यक्ष प्रीतम सिंह की कुर्सी के लिए बहुत बड़ा खतरा पैदा हो गया है। ब्राह्मण-ठाकुर समीकरण को सेट करने के लिए काँग्रेस आला कमान की मजबूरी हो गई है कि उनकी जगह किसी ब्राह्मण चेहरे को लाया जाए। उनको LoP की ज़िम्मेदारी दी जाए। अब उड़ती खबर अंदरखाने की ये है कि प्रीतम पार्टी हित में इसके लिए राजी हो गए हैं। शर्त ये है कि उनके सबसे वफादार-करीबी सूर्यकांत धस्माना को उनकी जगह गद्दी सौंपी जाए। किसी और का नाम उनको मंजूर न होगा। दूसरी तरफ उत्तराखंड सियासत के उस्ताद समझे जाने वाले दिग्गज हरीश रावत ने अपने मरजीवड़े गणेश गोदियाल को PCC अध्यक्ष बनाने के लिए पूरी ताकत झोंक डाली है।

गणेश गोदियाल को PCC अध्यक्ष के लिए हरीश रावत के शीर्ष पसंद के तौर पर देखा जा रहा है

विधानसभा चुनाव जब कुछ महीनों की बात रह गई हो तो PCC अध्यक्ष की अहम कुर्सी शायद ही कोई आसानी से छोड़ना चाहेगा। पार्टी नेतृत्व के लिए हालांकि प्रीतम अभी भी वाकई पसंदीदा हैं, लेकिन इन्दिरा हृदयेश के अचानक निधन हो जाने से सारे समीकरण ध्वस्त हो गए। सब कुछ उलट-पुलट हो गया है। इन्दिरा थीं तो ब्राह्मण-कुमाऊँ और महिला वाला समीकरण बाखूबी पूरा करती थीं। ऐसे में ठाकुर-गढ़वाल के कोटे वाले प्रीतम को चुनौती कहीं से नहीं मिल रही थीं। कुछ वक्त पहले तक ये सोच भी नहीं पैदा हुई थी कि PCC अध्यक्ष पर बदलाव भी हो सकता है।

करन माहरा

ना-नुकुर और नाराजगी जताने के बाद माना जा रहा है कि वफादार पार्टीमैन की तरह प्रीतम Leader of The Opposition बनने के लिए तैयार हो गए हैं। चुनावी साल में लेकिन वह संगठन पर अपनी मजबूत और सम्पूर्ण पकड़ छोड़ने को राजी नहीं हैं। वह इस कोशिश में हैं कि अपनी जगह वह सूर्यकांत धस्माना को अध्यक्ष बना दें। उस सूरत में एक किस्म से सांगठनिक सत्ता उनके हाथ में परोक्ष तौर पर बनी रहेगी। हरीश रावत और उनका खेमा ऐसा नहीं होने देना चाहते हैं। उनको लग रहा कि इससे सब कुछ प्रीतम के माकूल हो जाएगा। चुनाव में उनके हाथ में कुछ नहीं होगा।

उत्तराखंड सियासत का इतिहास ये ही बताता है कि अगली बार सरकार में काँग्रेस आ सकती है। दो दशक में यही होता रहा है। BJP-Congress जब भी विपक्ष में रहीं, चुनाव जीत के सरकार की लगाम थाम ली। सरकार जैसा काम भी करे, उसकी पार्टी कभी भी चुनाव नहीं जीत पाई है। अगर इस बार BJP जीत जाती है तो ये CM तीरथ सिंह रावत की सबसे बड़ी और अहम सियासी उपलब्धि होगी। इस इतिहास के चलते ही उत्तराखंड काँग्रेस में कौरव-पांडव वाला महाभारत छिड़ गया है।

फर्ज करें, इतिहास के अनुरूप चुनावी नतीजे आते हैं तो फिर काँग्रेस में CM कौन की लड़ाई छिड़ेगी। जिस खेमे के विधायक अधिक होंगे, उसके ही नेता विधायक दल (यानि CM) चुने जाने की उम्मीद सबसे मजबूत होगी। टिकट बँटवारे में पार्टी के प्रभारी से अधिक भूमिका प्रदेश अध्यक्ष-चुनाव संचालन (अभियान) समिति के संयोजक की रहती है। सूत्रों का कहना है कि अनुभव-वरिष्ठता के साथ ही संगठन में राष्ट्रीय महामंत्री होने के चलते अभियान समिति के संयोजक की कुर्सी हरीश के नाम पर बुक हो चुकी है।

हरीश भले पिछले चुनाव में दो जगह से लड़ के भी विधानसभा नहीं पहुँच पाए, लेकिन उनका कद इन पाँच सालों में बढ़ा ही है। उन्होंने शिकस्त का स्यापा करने के बजाए खुद को जबर्दस्त ढंग से व्यस्त रखा है। सियासी से अधिक सामाजिक आयोजनों और बयानों से अपनी फैन फॉलोइंग में इजाफा किया है। वह भले कहते रहे हैं कि काँग्रेस सरकार बनाती है तो वह CM का चेहरा नहीं होंगे, लेकिन हकीकत ये है कि वह CM का चेहरा हर हाल में होंगे। उनका चेहरा न होना और कोई भी चेहरा अभी घोषित करने की जरूरत पार्टी फोरम में उठाना, जुमला से अधिक नहीं है।

प्रीतम खेमा इस खतरे-हकीकत से अनजान नहीं है। इस कारण ही वह PCC अध्यक्ष की कुर्सी किसी और के हाथ नहीं जाने देना चाहता है। उसको ये आशंका है कि ऐसा नहीं हुआ तो चुनाव की बागडोर पूरी तरह हरीश के हाथों चली जाएगी। चुनाव अभियान समिति और PCC अध्यक्ष जब एक ही खेमे के पास होगी तो बाकी के लिए फिर कुछ करने को नहीं रह जाएगा। चुनाव के चले ही हरीश-प्रीतम खेमा दांव-पेच लगातार चल रहे। इन्दिरा के परलोकवासी होने से प्रीतम का सबसे मजबूत हाथ चला गया। इससे हरीश खेमे को बल मिला हुआ है।

काँग्रेस में ये आपसी खंजरबाजी इस कदर जबरस्त न होती, अगर उसके पास पर्याप्त विधायक और ब्राह्मण विधायक होते। इंदिरा अकेली ब्राह्मण विधायक पार्टी की थीं। उनके जाने के बाद अब दो मुस्लिम-1 SC और 7 ठाकुर विधायक ही पार्टी के पास रह गए हैं। शुरुआती दौर में करण माहरा का नाम भी PCC अध्यक्ष और LoP के लिए चला था। उनका ठाकुर होना उनके आड़े आ गया। वह साफ-सुथरी छवि-प्रतिष्ठा रखते हैं। अजय भट्ट सरीखे दिग्गज BJP नेता को हराने के चलते सुर्खियां बटोरते रहे हैं।

करण को ले के अहम पहलू ये है कि वह हरीश के करीबी संबंधी हैं लेकिन पार्टी सियासत में प्रीतम उनके गुरु-मेंटर-नेता हैं। अब उनको दावेदार की सूची से अलग कर दिया गया है। उत्तराखंड काँग्रेस अध्यक्ष को ले के अंतर्कलह एक-दो दिन अभी दिल्ली में और चलने के आसार हैं। BJP भी अपने मुख्य प्रतिद्वंद्वी पार्टी की इस आपसी लड़ाई पर करीबी नजर रखे हुए है। इन सब पहलुओं पर चर्चा के बाद ये बताना भी जरूरी हो जाता है कि कभी प्रीतम भी हरीश खेमे के सिपहसालार हुआ करते थे। विजय बहुगुणा को CM की कुर्सी से बेदखल कर हरीश को लाने वालों में वह भी प्रमुख लोगों में से थे। ताजा हालात सिर्फ सियासत का हिस्सा भर है।   

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