Big खतरा!! CM साहब ये Family वाले नहीं, पुलिस के ही जवान समझो..

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कानून-व्यवस्था संभालने वाली पुलिस ही अगर आंदोलन के साथ हो तो खतरे की घंटी

Chetan Gurung

ऐसा UP में 1973 में हुआ था। तब PAC के जवानों ने अपने साथ हो रहे बर्ताव को ले के खूनी विद्रोह कर दिया था। हालात इस कदर संगीन हो गए थे कि सरकार को सेना की मदद लेनी पड़ी थी। PAC के 30 जवान सेना की गोलियों का शिकार हो गए थे। अनेक बुरी तरह घायल हो गए थे। 5 दिन तक छिड़े इस हिंसक विद्रोह को PAC म्यूटिनी कहा जाता है। तब की UP सरकार मसले की गंभीरता को समझ के फौरी कार्रवाई करने में नाकाम रही थी। इसका खामियाजा ये विद्रोह साबित हुआ था। उत्तराखंड में पुलिस के जवान तो नहीं लेकिन उनके परिवार वाले आज ग्रेड पे 46 सौ करने की मांग ले के सड़कों पर आंदोलन करने उतरे और ये अभूतपूर्व है। CM पुष्कर सिंह धामी के लिए ये निश्चित रूप से बहुत बड़ी चुनौती है और आगे ये संकट सिर दर्द बन सकता है। ये देखना अहम होगा कि सरकार इस मसले को किस तरह और कितनी जल्दी हल कर पाती है।

सीएम पुष्कर सिंह धामी के लिए पुलिस कर्मियों के ग्रेड पे का मसला सुलझाना अहम होगा

आंदोलन में भले पुलिस के जवान शामिल न हो, लेकिन उनके परिवार के लोग अगर सरकार के कदम के खिलाफ उतरे हैं तो ये कम गंभीर बात नहीं है। आखिर बिना पुलिस कर्मियों की सहमति और मदद के उनके परिवार के लोग सड़कों पर क्यों उतरेंगे। उत्तराखंड की 35 हजार के करीब की तादाद वाली पुलिस में अधिकांश आंदोलनकारी परिवारों से ही हैं। सरकार अगर जल्द से जल्द इस मुद्दे को हल करने में सफल नहीं रहती है तो हालात बाद में बिगड़ भी सकते हैं।

पुलिस कर्मियों के परिवार के लोगों के आंदोलन को हल्के ढंग से बिल्कुल नहीं लिया जा सकता है। सरकार उनको बल पूर्वक या फिर दबाव में ले के उनका आंदोलन खत्म नहीं कर सकती है। ऐसा करने के लिए उसको पुलिस की ही जरूरत होगी, जो सरकार के फरमान को इस मामले में कितनी गंभीरता से लेगी, कहा नहीं जा सकता है। UP PAC के जवानों ने सेवा शर्तों और व्यवस्थाओं के विरोध में ही हिंसक विद्रोह कर दिया था, जबकि यहाँ मामला सीधे Grade Pay और कुल तनख्वाह से ताल्लुक रखता है, जो कहीं अधिक संवेदनशील है।

UP सरकार ने फौज के इस्तेमाल के जरिये PAC विद्रोह का सख्ती से दमन किया था। PAC के 30 जवानों के गोरखा रेजीमेंट के हाथों मारे जाने के साथ ही सेना पर गोली चलाने वाले 500 जवानों को बर्खास्त भी कर दिया गया था। कई विद्रोहियों को आजन्म कारावास तक हुई। वह UP सरकार के लिए भी काला इतिहास है। उत्तराखंड सरकार के मस्तिष्क में UP PAC म्यूटिनी जरूर होगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि वह ऐसी नौबत नहीं आने देगी। हकीकत ये है कि अब तक के हालात ईशारा कर रहे हैं कि पुलिस के आंदोलन कर रहे जवानों को ग्रेड पे से जुड़े तकनीकी पहलू समझा पाने और मनाने में उत्तराखंड सरकार सफल नहीं रही है।

सरकार और पुलिस के आला अफसरों के मुताबिक 7th Pay Commission में ही ऐसी व्यवस्था कर दी गई है कि राज्य सरकार के लिए आंदोलनकारी पुलिस परिवारों की मांग को स्वीकार करना मुमकिन नहीं है। ऐसा अगर है तो सरकार को इसके विकल्प की तलाश करनी चाहिए। आखिर कोई भी कर्मचारी वेतन में वृद्धि के बजाए उसमें कमी को बर्दाश्त नहीं करेगा। पिछली त्रिवेन्द्र और तीरथ सरकार इस मामले को शायद गंभीरता से उतना नहीं ले पाई, जितनी जरूरत थी। पुष्कर सरकार के लिए ये मुद्दा निश्चित रूप से जल्द से जल्द हल करना बहुत अहम है।

विधानसभा चुनाव में ये मुद्दा काँग्रेस और आम आदमी पार्टी हाथों हाथ ले लेगी, ये तय है। चुनाव में कई सीटों पर हार-जीत का अंतर चंद सैकड़ों में होता रहता है। ऐसे में पुलिस के हजारों जवानों के परिवारों की नाराजगी सियासी गणित के हिसाब से भी बीजेपी और सरकार के लिए फिक्र का सबब बन सकती है। कोई भी विपक्षी दल इतने अहम मुद्दे से खुद को जोड़ के सरकार बनाने की कोशिश से नहीं चूकेगी।

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