नौकरशाही पर नियंत्रण ही किसी CM को नायक-नाकाम बनाता है

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सचिवों की जॉइनिंग टलने से उठ रहे सवाल:आधिकारिक रिपोर्ट जुटा रहा कार्मिक महकमा

पुष्कर सरकार के लिए अभी तक सब कुछ ठीक चल रहा लेकिन कठिन इम्तिहान भी आएंगे

The Corner View

Chetan Gurung

CM Pushkar Singh Dhami

ND तिवारी की पाँच साल की और BC खंडूड़ी की शुरुआती एक साल की सरकार को इस मायने में श्रेष्ठ माना जा सकता है कि उस दौरान सरकार का नौकरशाही पर पूरा नियंत्रण था। कोई और सरकार ऐसी नहीं आई जो नौकरशाही को काबू कर पाई हो या फिर उससे वैसा काम ले सकी, जैसा वह चाहती थी। मौजूदा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को भी ये साबित करना है कि वह नौकरशाही के प्रभाव में नहीं आने वाले हैं और अफसरों को सरकार की नीति-रीतियों को अपनाते हुए काम करना ही होगा। वह भले पहली बार सिस्टम को भीतर से देख रहे हैं, लेकिन इस बात का एहसास उनको अच्छे से है कि नौकरशाही आखिर किस बला या वरदान का नाम है। नौकरशाही पर नियंत्रण या फिर नाकामी ही किसी CM के नायक या फिर नाकाम होने के रिपोर्ट कार्ड का आधार बनता है।

Chetan Gurung

ऐसा लग रहा है कि उनके सामने अब कठिन सवाल पूछने वाली चुनौतियाँ आने वाली हैं। सचिवों के तबादलों के बाद कुछ जॉइनिंग इतने दिनों बाद भी न होना सरकार के `प्रताप’ पर सवाल खड़े कर देता है। PM नरेंद्र मोदी से पूरी ताकत-छूट ले के आए पुष्कर निश्चित रूप से ऐसा नहीं होने देना चाहेंगे। आखिर वह भली-भांति जानते हैं कि जब विधानसभा चुनाव आएंगे तो ये सब मुद्दे बन के उभरेंगे। चुनाव में कुछ ऊंच-नीच हो गया तो मोदी-शाह की जोड़ी के साथ ही पूरा आला कमान और संघ उनसे कड़े सवाल जरूर करेगा। तिवारी जैसा व्यापक-अद्भुत अनुभव तो किसी भी बाद के या फिर उनसे पहले के मुख्यमंत्रियों के पास नहीं रहा लेकिन ये सच है कि उनके दौर में धुरंधर और फन्ने खान किस्म के बेहद वरिष्ठ और अनुभवी नौकरशाहों की भी घिग्घी बंधी होती थी।

खास पहलू इसमें ये है कि उनको कभी ऊंची आवाज या फिर कड़वी जुबान में बोलते किसी ने नहीं देखा। ये उनका निजी प्रताप था कि उनकी जुबान से निकला शब्द सख्त आदेश जैसा समझा जाता था। स्नेह-प्यार से बात करने के साथ ही ये दम उनमें ही था कि साल 2002 में दारोगा भर्ती घोटाला जब सामने आया तो DGP प्रेमदत्त रतूड़ी को फारिग कर डाला। IGP राकेश मित्तल को तो मुअत्तल ही कर दिया था। हाल में रिटायर हुए DGP अनिल रतूड़ी आज तक बतौर गवाह कोर्ट-कचहरी में घिरे हैं। अदालत में लंबे-लंबे सवालात का सामना कर रहे हैं। प्रमुख सचिव (गृह) रहने के दौरान ये घोटाला हुआ था। इसलिए मुख्य सचिव बन के रिटायर हुए सुरजीत किशोर दास आज 73 साल की उम्र में भी कोर्ट के चक्कर लगा रहे। CBI जांच इसकी चल ही रही अभी भी।

पौड़ी का बहुचर्चित पटवारी भर्ती घोटाला भी उसी दौरान हुआ। DM एसके लांबा को मुअत्तल किया। CDO (बाद में सचिव बन के रिटायर) कुँवर राजकुमार और SDM विनोद रावत (इस घोटाले में नाम आने से IAS बन ही नहीं पाए) पर भी कार्रवाई की। 78 पटवारियों को बर्खास्त किया गया। फिर आया प्रदेश की सियासत को हिलाने वाले जैनी सेक्स स्कैंडल। आज के मंत्री हरक सिंह रावत उस काँग्रेस सरकार में भी मंत्री थे। इस स्कैंडल में जैनी ने उनका नाम लिया था। पंडित जी ने बहुत चतुराई से उनका इस्तीफा एक किस्म से फुसला के-धमका के ले लिया था। अरबों रुपयों का सिडकुल घोटाला भी तभी उजागर हुआ था। उस घोटाले में जिस-जिस भी IAS अफसर और अन्य के नाम आए, सभी को एक किस्म से तिवारी ने तड़ी पार सफाई से कर दिया था।

इनमें तमाम बड़े IAS संजीव चोपड़ा-पराग गुप्ता-आलोक कुमार के भी नाम उछले थे। हालांकि बाद में खंडूड़ी सरकार आई तो जांच आयोग बिठाया गया। जिसका नतीजा करोड़ों रुपए आयोग पर खर्च करने के बावजूद कुछ नहीं निकला। मामला दबा सा दिया गया। संजीव कुछ ही महीने पहले IAS अफसरों को ट्रेनिंग देने वाली LBS एकेडमी मसूरी से रिटायर हुए। बाकी दोनों अभी अपने-अपने मूल कैडर राज्य में नौकरी कर रहे हैं। तीनों प्रतिनियुक्ति पर उत्तराखंड आए थे। घोटाला सामने आने पर सभी को कार्यमुक्त कर दिया गया था। तिवारी के वक्त मधुकर गुप्ता-डॉ. रघुनंदन सिंह टोलिया, M रामचंद्रन और सुरजीत किशोर दार सरीखे दिग्गज मुख्य सचिव रहे। किसी की मजाल नहीं थी जो CM की हुक्म उदूली जरा सी भी कर दे। भले सभी CM के बेहद करीबी थे। पंडित जी जानते थे कि नौकरशाही और सियासी उस्ताद के बीच कितनी दूरी रखना जरूरी होता है।

खंडूड़ी जब CM बने तो तिवारी जैसी धमक के साथ ही आए थे। एक साल तक तो सब ठीक चला, लेकिन उसके बाद उनकी पकड़ हाथ से निकल गई। सच तो ये है कि उनके दौर में नौकरशाही में उनके सचिव प्रभात कुमार सारंगी का दबदबा और उससे अधिक खौफ उनसे वरिष्ठ नौकरशाहों तक में दिखता था। मंत्री तक उनसे निर्देश इस तरह लिया करते थे, मानो साक्षात CM सामने हों। हालांकि, अनिल गोयल और मरहूम उमेश अग्रवाल भी उनके बेहद करीबी सियासी लोग थे, लेकिन खास तौर पर अनिल विवादों से दूरी बना के चलना पसंद करते थे। बाद के दौर में BCK बेहद कमजोर CM दिखाई दिए। जो नौकरशाही उनसे शुरुआत में काँपा करती थी, वह उनको हल्के में लेने लग गई थी। फिर वह हटा भी दिए गए। उनकी जगह रमेश पोखरियाल निशंक को लाया गया था। जो सुलझे हुए तो थे लेकिन नौकरशाही को संभाल पाना उनके लिए भी मुमकिन नहीं दिखा।

खंडूड़ी को दुबारा फिर 2011 में CM बनाया गया तो एक बार फिर उनका दबदबा झलका लेकिन चुनाव सिर पर होने के कारण जल्द ही नौकरशाहों के दिमाग पर तारी उनका खौफ गायब हो गया। इसके बाद जो भी CM आए, चाहे वह विजय बहुगुणा-हरीश रावत (दोनों काँग्रेस सरकार) हो या फिर त्रिवेन्द्र सिंह रावत और हाल ही में चार महीने के CM बन के हट गए तीरथ सिंह रावत, नौकरशाही ने उनको कभी उस हिसाब से नहीं लिया, जैसा अवाम देखना चाहती है। इससे खराब मिसाल और क्या हो सकती कि खुद CM ये शिकायत करते पाए जाते रहे हैं कि नौकरशाह लोगों के फोन तो उठाते नहीं, खुद उनके ही फोन भी कई मर्तबा नहीं उठाते हैं। सरकार भले कई सर्कुलर निकालती रहती है कि फोन जरूर उठाए जाएँ। न उठा सके तो कॉल बैक किया जाए। फोन का बिल और हैंड सेट का खर्च तक सरकार के खजाने से जाता है। योजनाओं पर पलीता ऐसे लगता है कि बस वह फाइलों में ही कैद हो के रह जाता है। अफसर उन पर इतने सवाल खड़े कर देते हैं कि मातहत भी फाइल पर हाथ डालने से डर जाते हैं।

ये मुद्दा इस लिए भी प्रासंगिक हो उठा है कि पुष्कर सरकार ने हाल ही में जिन नौकरशाहों के तबादले किए हैं, उनमें से कुछ ने अभी तक नई ज़िम्मेदारी जॉइन नहीं की है। पुरानी भले छोड़ दी। कुछ फिर से पुराने महकमे वापिस पाने की जुगत कर रहे तो कुछ केंद्र सरकार में प्रतिनियुक्ति चाह रहे। कोई DM बनने को अधिक  प्राथमिकता दे रहे। सरकार को मजबूर हो के कहें या फिर डर दिखाने के लिए, कार्मिक विभाग से वह पुराना सर्कुलर फिर सरकुलेट करना पड़ा, जिसमें लिखा गया है कि All India Service के अफसर अगर किसी भी किस्म का दबाव बनाने की कोशिश करते हैं तो उनके खिलाफ Act के मुताबिक सुसंगत कार्रवाई की जाएगी। ऑल इंडिया सेवा में भले IPS-IFS (वन) भी आते हैं लेकिन ये सर्कुलर खास तौर पर IAS अफसरों के लिए निकाला गया था। ये सब जानते हैं। पुष्कर सरकार के पास पार्टी विधायकों की विशाल फौज और मोदी-शाह-नड्डा-संघ का अपार समर्थन है। ऐसे में उनके लिए नौकरशाही पर लगाम लगाना और उसका रुख इच्छित दिशा की ओर मोड़ना मुश्किल या चुनौती भरा तो है लेकिन नामुमकिन नहीं।

वह अगर ऐसा नहीं कर पाते हैं तो ये उनकी ही निजी नाकामियों में शुमार किया जाएगा। कामयाबी तो उनके खाते में जाएगी ही। ये भी हकीकत है। ये सब कर के ही वह अपनी अगुवाई में फिर से उत्तराखंड में BJP सरकार ला सकते हैं। ऐसा उत्तराखंड के 21 साल के इतिहास में कभी नहीं हुआ कि बीजेपी या काँग्रेस की सरकार लगातार दो बार बनी हो। पुष्कर ये चक्रव्यूह अगर तोड़ने में कामयाब हो जाते हैं तो उनका नाम देश के युवा और अग्रिम पंक्ति के भविष्य के BJP नेताओं में शामिल हो जाएगा। अभी भी कुछ नौकरशाह सियासी रसूख और सम्बन्धों का इस्तेमाल कर अपने लिए मलाईदार महकमों का बंदोबस्त करने या फिर मलाईदार महकमों को बनाए रखने के लिए जुगाड़-कूट रचना में लगे हुए हैं। पुष्कर इस संजाल को कैसे ध्वस्त कर पाते हैं, इस पर भी सभी की पैनी निगाहें हैं। वैसे अंदरखाने की रिपोर्ट ये है कि कार्मिक विभाग को ऐसे नौकरशाहों की रिपोर्ट तैयार करने के निर्देश दे दिए गए हैं, जिन्होंने अभी तक नई पोस्टिंग जॉइन नहीं की है। इस रिपोर्ट के आधार पर सरकार आगे कोई कार्रवाई कर सकती है।      

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