सियासी तीरंदाजी::सेंधबाज़ बन रही BJP-Congress::फुसला रहे एक-दूसरे के MLAs

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विधानसभा चुनाव:एक तरफ पुष्कर And पार्टी, दूसरी तरफ हरीश-गणेश और कोई नहीं

CM-PCC अध्यक्ष के भविष्य के लिए बहुत बड़ा इम्तिहान:पार्टी रुख से खुश नहीं निष्ठावान

Chetan Gurung

बाएँ से दाएँ:प्रीतम सिंह-हरीश रावत-गणेश गोदियाल::तीनों एक साथ मिल के लड़ते हैं तो BJP को विधानसभा चुनाव में दिक्कत होगी, लेकिन सवाल ये कि क्या ऐसा हो पाएगा!

विधानसभा चुनावी महासमर फतह करना सत्तारूढ़ BJP-Congress से ज्यादा CM पुष्कर सिंह धामी और PCC अध्यक्ष गणेश गोदियाल के लिए निजी तौर पर बहुत अहम है। दोनों की सियासी जिंदगी को ये चुनाव बेहद बुरी या फिर अच्छी तरह प्रभावित करने वाला है। इसके लिए दोनों की अगुवाई में उनकी पार्टियां सेंधमार बन रही। एक-दूसरे के विधायकों और अहम चेहरों को अपनी ओर खींचने के लिए जान लगा रही हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि पुष्कर के साथ पूरी BJP का समर्थन है। गणेश और उनके सियासी God Father हरीश रावत का साथ पार्टी के कई सरदार अंदरखाने नहीं दे रहे।    

पुष्कर और गणेश के लिए ये चुनाव किस कदर अहमियत रखते हैं, इसको समझना कोई रॉकेट साइंस नहीं है। पुष्कर बहुत कम उम्र में मंत्री बने बिना CM बन गए। अब उनके पास दो ही विकल्प सियासी जिंदगी में रह गए हैं। या तो सदा CM बने रहना होगा। या फिर केंद्र की सियासत का हिस्सा होना मजबूरी होगी। राज्य में मंत्री बनना अब उनके लिए मुमकिन नहीं है। न ही MLA बने रहना उनकी निजी सियासत को रास आएगा। उनके पास BJP की राष्ट्रीय राजनीति में बहुत ऊपर जाने का सुनहरा अवसर है। उत्तराखंड में आज तक न BJP न ही Congress सत्ता में रहते हुए आम चुनाव जीत पाई है। पुष्कर ने BJP को फिर जितवा दिया तो उनका कद कई मायनों में बढ़ जाएगा।

वह CM तो बने रहेंगे ही। साथ ही PM नरेंद्र मोदी-HM अमित शाह और RSS की नजरों में उनका दर्जा कहाँ जाएगा, ये सिर्फ सोचा जा सकता है। ये तो तय है कि चुनाव जीतने की सूरत में BJP अब पुष्कर की जगह किसी और चेहरे को CM नहीं लाएगी। CM बदलते रहने को ले के वह पहले ही जग हँसाई का सामना कर रही है। फिर जो शख्स-CM पार्टी को इतिहास बदलने वाली जीत दिलाए, उसको बदलने की कल्पना भी नहीं की जा रही। PCC अध्यक्ष के तौर पर गणेश अगर पुरानी परंपरा को कायम नहीं रख पाए तो उनके सियासी जिंदगी को ये बहुत बड़ा धक्का होगा। उनकी आगे की सियासी पटरी उखड़ सकती है।

चुनावी परंपरा के लिहाज से अब तो बिना कुछ किए भी काँग्रेस को सत्ता में आना ही है। आम आदमी पार्टी की हैसियत अभी BJP-Congress को बेपटरी कर खुद सत्ता में आने की नहीं बनी है। गणेश की खासियत ये है कि वह न सिर्फ दमदार और मिल जुल के चलने वाले हैं, बल्कि नई सोच और आक्रामक तेवर भी प्रदर्शित कर रहे हैं। इसमें कोई शक नहीं कि उनकी अगुवाई में पार्टी न सिर्फ जिंदा और हरकत में दिख रही बल्कि सत्तारूढ़ पार्टी को कड़ी चुनौती देती दिख रही। बेहद कठिन दौर में मोदी-शाह की BJP को शिकस्त देना उनके लिए वाकई बहुत मुश्किल-बड़ी चुनौती है। मोदी-शाह के दाँत खट्टे करने वाले अरविंद केजरीवाल और ममता बनर्जी वाला तिलिस्म अभी भी गणेश-हरीश में नहीं दिखता है। दोनों मेहनती बहुत हैं ये जरूर सच है।   

पुष्कर और गणेश को चुनाव के आधार पर टीका अपना भविष्य अच्छी तरह मालूम है। इसके चलते वे अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ रहे। इस मामले में पुष्कर अधिक तकदीर वाले कहे जा सकते हैं। वह निजी अंदरूनी सियासत से अप्रभावित दिख रहे। पार्टी में उनकी निजी विरोधी नहीं हैं। कुछ मंत्री-विधायकों की पार्टी के भीतर आपसी निजी सियासत और राजनीतिक खींच तान ही चल रही। हरक सिंह रावत, सतपाल महाराज, उमेश शर्मा काऊ रह-रह के अपने तेवरों से कुछ सियासी गर्मी लाते तो हैं लेकिन सनसनी नहीं फैला पाते हैं। सभी जानते हैं कि ये उनका राजनीति करने का अंदाज है। उनके तेवरों में किसी को नयापन या फिर चौंकाने वाली बात नहीं दिख रही। इसको उनकी BJP आला कमान पर दबाव बनाने की रणनीति का हिस्सा कहा जा सकता है।

काँग्रेस में हालात बाहरी तौर पर इतने गंभीर नहीं दिखते लेकिन हकीकत जुदा है। अंदरखाने की खबर ये है कि कई MLA और बड़े नाम BJP के रणनीतिकारों और सूत्रधारों के साथ ही आला कमान और CM के संपर्क में हैं। इनकी तादाद अच्छी-ख़ासी है। ये सवाल उठ सकता है कि जब परंपरा के लिहाज से सरकार में आने की अगली बारी काँग्रेस की है तो फिर पार्टी छोड़ने के लिए कोई काँग्रेसी MLA क्यों कर तैयार होगा! इसकी वजह पार्टी के भीतर चल रही जबर्दस्त खींचतान और एक-दूसरे को पटखनी देने की कोशिश का तेज होना है। गणेश के साथ सूरमा हरीश रावत हैं लेकिन प्रीतम सिंह और उनके साथ की लॉबी अब अलग रुख अपना सकती है।

सरकार आने की सूरत में हरीश को CM के तौर पर देखने के लिए प्रीतम लॉबी शायद ही राजी होगी। ऐसा भी माना जा रहा है कि जरूरत पड़ी तो काँग्रेस में चुनाव के बाद दो-फाड़ भी करने की कोशिश BJP की तरफ से हो सकती है। इसमें उसको वैसे भी PhD हासिल है। सूत्रों की माने तो अभी से तोड़-फोड़ की कोशिशें बहुत तेजी से चल रही। हरीश सरकार के दौरान जिस तरह BJP ने उनको कुर्सी से हटाने के लिए MLAs-मंत्री अपने खेमे में कर लिए थे, वैसा खतरा आगे भी चुनाव के बाद नजर आ रहा है। काँग्रेस के कई अलमबरदारों को ये महसूस हो रहा कि ऐसा न हो कि सबसे बड़ी पार्टी बनने के बावजूद उनके हाथ सत्ता की चाबी न आए। पार्टी में टूट-फूट हो जाए और सरकार बनाने का मौका बीजेपी को मिल जाए।

BJP ने जब हरीश सरकार गिराई थी, तब MLAs की खरीद-फरोख्त के आरोप खूब लगे थे। इसको किसी ने पूरी तरह निराधार भी नहीं माना था। फिर कई काँग्रेस छोड़ तो पूरे 5 साल मंत्री भी बने। भले उनकी जरूरत बाद में कहीं नहीं दिख रही थी। इससे बीजेपी को ले के काँग्रेस के असंतुष्टों और बागियों में बीजेपी का रुख करने की कोशिश बढ़ जाएगी। वे काँग्रेस के पिछली सरकार के बागियों को देख के समझ गए हैं कि उनके साथ भी BJP में अच्छा ही होगा। भले उनकी अहमियत न रह जाए। हरक-यशपाल-सुबोध उनियाल रेखा आर्य अभी भी मंत्री हैं। तीनों काँग्रेस की पृष्ठ भूमि से हैं। काँग्रेस के लिए अपने बड़े नामों और पुराने लोगों को चुनाव से पहले BJP की देहरी लांघ के जाने से रोकना बहुत बड़ी चुनौती है।

BJP के लिए कुछ चिंता की बात काँग्रेस से आए मंत्रियों के बदलते सुर और तेवर हैं जरूर लेकिन इससे उसके सरमायादार बहुत फिक्रमंद हैं, ऐसा नहीं लगता है। उसके पास नेताओं की दूसरी पंक्ति भी तैयार है। इतना जरूर है कि वह किसी भी प्रभावशाली नाम को पार्टी छोड़ने देने के हक में कतई नहीं है। दोनों दलों की रणनीतिकार इन दिनों एक-दूसरे के बड़े नामों को किसी न किसी तरह वादा कर के और लुभा के साथ जोड़ने की कोशिश में डूबे हुए हैं। हरीश के करीबी समझे जाने वाले कुमायूं के एक MLA और गढ़वाल के भी एक First Timer विधायक को ले के बहुत खुसर-पुसर है कि दोनों कभी भी कमल के फूल को सवारी चुन सकते हैं।

ये ही आलम BJP के भी सरकार के कम से कम दो मंत्रियों को ले के चल रहा। कौन सी पार्टी इस `पधारो म्हारे दल’ में के खेल में अधिक बड़े नेता बहला-फुसला और किसी भी तरह लपेट के लाती है, ये तस्वीर चुनाव से ऐन पहले तक भी बहुत साफ शायद ही होगी। ये खेल लगातार चलता रहेगा। बड़े नेताओं के बाद छोटे-छोटे सूबेदारों फिर जमींदारों पर भी दोनों दल अपना जाल फेंकेंगे, ये तय है। BJP हो या फिर काँग्रेस, दोनों के ही निष्ठावान कार्यकर्ताओं को अपनी लीडरशिप से ये जरूर शिकायत हो सकती कि आड़े-बुरे वक्त पर वे पार्टी के साथ स्तम्भ बन के खड़े रहते हैं। जब टिकट देने की बारी आती है तो पुराने दगाबाज और घुसपैठियों को उन पर तवज्जो देने की कोशिश हो रही। काँग्रेस के भीतर की सिर्फ-फुटव्वल पार्टी को अधिक गहरा धक्का दे सकती है। हरीश का टिमटिमाता सियासी दिया बुझ सकता है। गणेश के लिए दिक्कत उत्पन्न कर सकता है।

पुष्कर को ये फायदा है कि उनके पास इस किस्म के काम के लिए पूरा BJP का सिस्टम है। जो इस अभियान में व्यस्त है। वह सरकार के CEO की तरह शिलान्यास-घोषणाओं की ऐसी बौछार कर रहे, जैसा मानो बादल फटने पर एक साथ पानी गिरता है। वह अपनी शैली-बर्ताव-अंदाज से छाप छोड़ रहे। पार्टी की दशा को कहीं बेहतर कर चुके हैं। चुनाव तक इसे वह और कितनी तेजी दे पाते हैं और कितना असर और अधिक छोड़ सकते हैं, इस पर भी चुनाव के नतीजे निर्भर करेंगे। नए PCC अध्यक्ष गणेश के लिए दिक्कत ये है कि अगर उनकी पार्टी जीतती है तो उनके विरोधी कह सकते हैं कि ये तो परंपरा के मुताबिक होना ही था। नतीजा उल्टा हो गया तो वे हरीश संग गणेश पर नून-तेल ले के चढ़ पड़ेंगे।

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