सबसे युवा CM के जन्मदिन पर विशेष!!उम्मीदों-रिश्तों का खिलता-महकता पुष्प `पुष्कर’

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मुख्यमंत्री की कुर्सी महज पड़ाव,मंजिल और बड़ी

Chetan Gurung

रोज माँ का आशीर्वाद लेना नहीं भूलते पुष्कर सिंह धामी

उत्तराखंड (तब उत्तरांचल) बन चुका था। नित्यानन्द स्वामी मुख्यमंत्री हो गए थे। भगत सिंह कोश्यारी इस दौड़ में पिछड़ ऊर्जा मंत्री हो गए थे। ये अन्तरिम सरकार थी। बीजेपी के पास सबसे अधिक विधायक थे। यूपी विधानसभा और विधान परिषद के मिला के। केंद्र में भी बीजेपी की ही अटल सरकार थी। काँग्रेस को मुख्य विपक्षी दल की भूमिका निभाने की ज़िम्मेदारी मिली। ये व्यवस्था 2002 में होने वाले पहले विधानसभा चुनाव तक के लिए थी। उन्हीं दिनों कोश्यारी के विधानसभा वाले दफ्तर में एक बेहद युवा-खुश मिजाज-व्यवहार कुशल और बेहद परिपक्व किस्म का सधा हुआ गौर वर्ण युवक दिखने लगा था। जनसम्पर्क अधिकारी के तौर पर। ये बात साल 2000 की सर्दियों (नवंबर-दिसंबर) की कर रहा हूँ। मेरी आज महाराष्ट्र के राज्यपाल कोश्यारी से पुरानी वाकफियत थी। बेतकल्लुफ़ी से सवाल करो और उतनी ही बेतकल्लुफ़ी से उनका घुमावदार जवाब। ये उनकी खासियत थी।

पत्नी गीता के साथ जन्मदिन पर ऐतिहासिक टपकेश्वर मंदिर गढ़ी कैंट में अर्चना करते CM पुष्कर सिंह धामी

उनको समझ पाना हर किसी के बूते की बात नहीं, ऐसा खुद बीजेपी के उनके करीबी और वरिष्ठ नेता कहा करते थे। ये आम तौर पर कहा जाता था कि कोश्यारी जी पूरब जाने का नाम लें तो आप पश्चिम समझें। उनके इस गुण को बाखूबी उस युवक ने समझ लिया था जो लखनऊ से हाल ही तक छात्र राजनीति कर के आया था। कम उम्र के बावजूद बेहद मँझा हुआ था। नौकरशाहों को बहुत सलीके से निबटना जानता था। कब और कहाँ प्रेम से और कब-किस से दांतों को चबा के कुछ सर्द लहजे में बात करना है, उसका माहिर दिखता था। फिर स्वामी पार्टी की अंदरूनी सियासत और अपने एक सनसनीखेज इंटरव्यू के चलते अन्तरिम सरकार में ही कुर्सी से रुखसत हो गए। कोश्यारी ने उनकी जगह ली। वह युवक अब ओएसडी की भूमिका में आ गया। अपनी भूमिका में और अधिक सिद्ध दिखता था। सीएम से मिलने जाया करता था तो कई बार उस नौजवान के स्नेह पूर्ण विशेष आग्रह पर चाय पीने बैठ ही जाता था। वह भी जानता था कि मेरा कोश्यारी से कुछ करीब का नाता है। पत्रकार के नाते भी बहुत सम्मान करता था। फिर पहला विधानसभा चुनाव आ गया। कोश्यारी-निशंक-खण्डूड़ी-स्वामी तथा कुछ अन्य छोटे-बड़े गुटों में बंटी बीजेपी अलग राज्य देने के बावजूद लोगों को ये एहसास दिला नहीं पाई कि वह सरकार चलाने में सक्षम है।

बच्चों से विशेष स्नेह रखते हैं सीएम पुष्कर

कोढ़ पर खाज ये कि अन्तरिम सरकार में ही सीएम बदल दिया जाना, राजधानी गैरसैण न बनाना, राज्यपाल, हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस-मुख्य सचिव-डीजीपी और सीएम का उत्तराखंड मूल का न होना लोगों को बुरी तरह अखरा। लोगों को लगता था कि इन कुर्सियों पर पहाड़ के लोग या पहाड़ी नाम वाले क्यों नहीं हैं? यही सब चलना है तो फिर उत्तरांचल राज्य बना के फायदा क्या हुआ? उनको लगता था कि केंद्र और राज्य की बीजेपी सरकारों ने उनको छल दिया। नया राज्य और सरकार का नया सिस्टम खुद उस वक्त की मीडिया के भी समझ में ढंग से नहीं आता था। हम लोग भी अचानक जिला स्तर से राज्य और शासन स्तर की उस पत्रकारिता में उतर गए थे, जिसका ककहरा अभी सीख ही रहे थे। कार्मिक सचिव के नाते जो अफसर तबादले के आदेश जारी करते थे, उसको गृह सचिव के हवाले से लिख दिया करते थे। इसलिए कि दोनों महकमे एक ही सचिव देख रहे होते थे। फिर गृह सचिव बहुत शक्तिशाली और ग्लैमर भरा लगा करता था। इसकी जानकारी तब शासन कवर करने वाले अधिकांश पत्रकारों और बहुत ही कम लोगों को थी कि जिस कुर्सी पर बाहरियों को बिठाने पर ऐतराज जताया जा रहा है, वहाँ सिस्टम काम करता है। भावनाएँ नहीं।

राज्यपाल सुरजीत सिंह बरनाला बने थे। हाइकोर्ट के चीफ़ जस्टिस, मुख्य सचिव (अजय विक्रम सिंह) और डीजीपी (एके शरण) अपनी वरिष्ठता के मुताबिक बनाए गए थे। एवी राजस्थान और शरण बिहार मूल के थे। बरनाला पंजाब के सीएम रह चुके थे। चीफ जस्टिस भी बाहरी थे। स्वामी को लोगों ने हरियाणवी मान लिया था। भले उनकी जिंदगी देहरादून में गुजरी। पल्टन बाजार में तब से 5 दशक पहले जनांदोलन को ले के पुलिस की लाठी खूब खाने की बात वह खुद बयां किया करते थे। उनकी पीड़ा सीएम होने के बावजूद झलकती थी कि उनको बाहरी बता के उनके खिलाफ पार्टी के भी कुछ लोग मुहिम चला रहे हैं। उस दौर में कोश्यारी ने उनकी जगह ली। तब वह नौजवान और अधिक फॉर्म में और अधिक परिपक्व दिखने लगा, जो शुरू से कोश्यारी के साथ था। वह कोई और नहीं बल्कि आज के तथा उत्तराखंड के अब तक के सबसे युवा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ही थे। वह पुष्कर जिनके कंधों पर बीजेपी की डोल चुकी नौका को 5-6 महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में पार लगाने और नया इतिहास लिखने का अहम दायित्व मोदी-शाह-संघ ने सौंपा है।

पुष्कर आज वैसे नहीं दिखते जैसा बीजेपी युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष होने के दौरान दिखा करते थे। या फिर जब 2007 में बीजेपी सत्ता में आई तो कोश्यारी को सीएम बनाने के लिए जैसा रूप और अंदाज उन्होंने अपनाया था। उनको विपक्ष पर बेहद हमलावर रहने और आक्रामक तेवरों के साथ ही जोशीले अंदाज के लिए जाना जाता था। भले आपसी बातचीत और बर्ताव में वह शुरू से ही बेहद शालीन-सलीकेदार रहे। अनुशासन जिंदगी में दिखता था। पिता के फौजी होने का भी ये असर कहा जा सकता है। पिथौरागढ़ के कनाली छीना से परिवार बेहतर भविष्य के लिए उधम सिंह नगर के खटीमा आ बसा था। फिर लखनऊ पढ़ने गए तो वहीं सियासत कैसे करते हैं, और कैसे खुद को आम लोगों के बड़े और कुशल राजनेता के तौर पर विकसित करते हैं, ये सीखा। कोश्यारी की सोहबत और उनका सरमायादार होना भी उनके लिए बार-बार काम आया। ये उनकी खूबी है कि बहुत जल्दी वह समझ गए कि जिंदगी में आगे बढ़ना है तो खुद को किसी के भी ठप्पे से दूर करना होगा। पीआरओ-ओएसडी की छवि को लोगों के जेहन से बाहर फेंकना होगा। ये काम उन्होंने सफलतापूर्वक किया।

पुष्कर से मेरे रिश्ते बाद में मित्रता में बदली। फिर इसमें मजबूती ही आती गई। पारिवारिक हो गया। मैंने शादी अपनी ही कॉलोनी में एक छोटे से मंदिर में साल 2005 में की थी। 3-4 दिन की तैयारी में ही। पुष्कर और आज संघ के ब्रज प्रांत के प्रचारक डॉ.हरीश रौतेला, अब रिटायर हो चुके पूर्व आईएएस अफ़सर अवनेन्द्र सिंह नयाल के साथ ही पुष्कर के आज के इकलौते ओएसडी डॉ. सत्यप्रकाश सिंह रावत (मैं उसको शुरू से ही प्रेमपूर्वक सत्या कहता हूँ) तथा 3-4 अन्य मित्र लोग इस दौरान मेरे साथ शादी की तैयारियों में डटे रहे। उस दौरान वे रात 12-1 बजे तक मेरे घर पर बैठे रहते थे। शादी के दौरान भी पुष्कर मंदिर में साथ थे। शायद ट्रैक सूट में ही। तमाम लोगों के दबाव में 10 दिन बाद पार्टी देनी पड़ी तो कार्ड लिखने तक का जिम्मा उठाने में पुष्कर और साथ के अन्य लोगों ने हिचक नहीं दिखाई थी। मेरे माता-पिता तब जीवित थे। उनके साथ खूब बातें किया करते थे। सच तो ये है कि शादी में पुष्कर ने कई किस्म से मदद की। मदद सिर्फ पैसों से नहीं होती। ये समझने वाली बात है।

काँग्रेस के आज के प्रदेश अध्यक्ष और मित्रा गणेश गोदियाल तथा नेता विरोधी दल प्रीतम सिंह भी उन लोगों में शुमार थे, जिन्होंने मेरा साथ तब अच्छे से निभाया। गोदियाल और पुष्कर बड़े और खुले दिल वाले हैं। दोनों आपस में बहुत अच्छे मित्र हैं। पुष्कर सीएम बने तो गोदियाल ने उनको फोन पर बधाई दी। गोदियाल काँग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष बने तो पुष्कर ने भी मेरे सामने ही उनको बधाई देने के साथ ही लंच पर निमंत्रित किया और साथ ही फोटो खिंचाने की बात कही। इस दौरान उनके साथ बैठे मंत्री स्वामी यतीश्वरानंद और विधायक राजेश शुक्ला भी अपने सीएम के इस रूप को देख के हैरान से दिख रहे थे। दरअसल आजकल रिश्ते पार्टियों की सीमाओं में बंध गए हैं। दुश्मनी की हद तक चले गए हैं। पुष्कर-गणेश ऐसे दौर में ताजी सियासी हवा की मानिंद दिखते हैं।

जब जनवरी-2011 में पुष्कर की शादी हुई तो मैं परिवार के साथ खटीमा पहुंचा था। मुझे याद नहीं कि मैं इससे पहले किसी राजनेता के परिवार की शादी में शरीक हुआ। पुष्कर में मुझे हमेशा एक सफल और बड़े राजनेता के गुण नजर आया करते थे। मैं जब भी उनसे मिलता या किसी से मिलवाता, उनका परिचाय ये कह के देता कि ये भविष्य के मुख्यमंत्री हैं। मंत्री मैंने कभी नहीं कहा। ये सब फकत बोलने के लिए नहीं बोलता था। पुष्कर की सभी धड़ों में अच्छी पकड़-संघ में भी प्रभाव, काबिलियत की झलक, क्षेत्रीय-जातिगत समीकरण, उनकी और बाकी लोगों की उम्र का अंतर तथा बीजेपी आला कमान की बदलती सोच को ध्यान में रख के कहता था। जब वह सीएम बने तो एक पूर्व नौकरशाह, जो मुख्य सचिव बन के रिटायर हुए ने मुझे फोन पर कहा, आप कहते थे कि ये मुख्यमंत्री बनेगा, और बन गए। इस पूर्व नौकरशाह ने काँग्रेसराज के बावजूद पुष्कर की उनके क्षेत्रों की विकास योजनाओं से जुड़ी फाइलों को कभी नजर अंदाज नहीं किया। उनकी अपने स्तर पर फाइलों को क्लियर कर खूब मदद की।

जब दूसरी बार पुष्कर विधायक बने तो उम्मीद थी कि शायद मंत्री बनाए जाएँ। ऐसा लेकिन हुआ नहीं। त्रिवेन्द्र सिंह रावत और तीरथ सिंह रावत की सरकार में उनको जगह नहीं मिली। इस भारी हल्ले के बावजूद कि वह मंत्री बनाए जा रहे। कभी-कभी वह कुछ निराश दिखते कि मंत्री नहीं बन पा रहे, लेकिन फिर दुगुने जोश से अपना काम शुरू कर देते। जिस दिन तीरथ सरकार का शपथ ग्रहण था, उस दिन वह रेस कोर्स के ट्रांज़िट हॉस्टल में थे। जब साफ हो गया कि मंत्रिमंडल या मंत्रिपरिषद में उनकी जगह नहीं बनी तो वह कुछ दुखी दिखे लेकिन फिर जल्द ही सामान्य ढंग से काम करने लगे। पुष्कर की तकदीर में सीएम बनना लिखा था। शायद इसीलिए तीरथ की अचंभित करने वाले अंदाज में सीएम की कुर्सी से विदाई हुई। फिर कभी मंत्री बनने की ख़्वाहिश रखने वाले पुष्कर सीधे सीएम बने। पुष्कर को इसलिए भी याद रखा जाना चाहिए कि वह अपने बुरे वक्त या फिर आड़े वक्त के साथियों को नहीं भूले हैं। उनके साथ जो भी नौकरशाह और प्राइवेट लोग काम कर रहे हैं, वे सदा उनके साथ हर हाल में रहे।

इसको वह छिपाते भी नहीं। एसीएस आनंदबर्द्धन, आईपीएस अभिनव कुमार, सत्या, नवीन (नन्दन), संयुक्त सचिव संजय टोलिया, उप सचिव राजेंद्र पतियाल, किशोर भट्ट को उन्होंने अहम जिम्मेदारियाँ सौंपी हैं। जिस दिन वह मुख्यमंत्री बने, बीजापुर गेस्ट हाउस में रात को मिला। खुद ही कहा कि दाई (बड़ा भाई) के साथ फोटो खींचो। कई बार बाद में भी हमने साथ फोटो खिंचवाई। घर परिवार की बातें भी कीं। मेरी शादी 13 फरवरी को हुई थी। इसी साल 13 फरवरी को सुबह मैं और पत्नी बाल्कनी में धूप में थे। अचानक पुष्कर और सत्या कॉलोनी की सड़क पर पैदल आते दिखे। मॉर्निंग वॉक करते हुए अपने यमुना कॉलोनी वाले घर से सीधे डाकरा कैंट के संजय विहार आ पहुंचे थे। मैंने उनसे पूछा कि आज कौन सा दिन है, याद है? उनको याद नहीं आया तो मैंने बताया कि आज के दिन मेरी शादी हुई थी। वह शादी, जिसमें पुष्कर ने खुद को कामकाज में झोंक डाला था। उन्होंने कहा, दाई याद नहीं रहा नहीं तो गुलदस्ता ले के आता। वह घर आते रहे। पत्नी गीता और दोनों प्यारे बच्चे दिवाकर और प्रभाकर के साथ भी आए। दो दिन पहले अचानक उनकी गीता, जिनको मैं बुवारी कहता हूँ, का फोन आया कि भैया आज डिनर पर आना है। भाभी और बेटे को ले के। हम रात को सीएम आवास पहुंचे थे। उन्होंने बहुत अपनत्व के साथ भोजन कराया। फोटो सेशन भी चला।

पुष्कर देर रात कामकाज से फारिग हुए। मेरे बेटे को वह बचपन से देखते रहे हैं। उससे खूब बातें कीं। उनके भी दोनों बेटे दिवाकर-प्रभाकर अब बड़े हो रहे। स्केटिंग के शौकीन हैं। अपनी कार्यशैली और साधी जुबान-भाषण से पुष्कर ने न सिर्फ छाप छोड़ी है बल्कि कोई शक नहीं कि बीजेपी को वह उत्तराखंड में फिर लगातार उठा रहे हैं। लोगों का खोया भरोसा उनको देख के बीजेपी की तरफ लौटता दिख रहा। उनके व्यक्तित्व और अंदाज का खास पहलू ये है कि वह जब आम लोगों के बीच होते हैं तो खुद को उनके साथ कनेक्ट कर लेते हैं। बुजुर्गों के चरण स्पर्श कर उनका आशीर्वाद लेते हैं। छोटे-छोटे बच्चों को गोद में उठा के उनके प्रति अपने प्रेम-स्नेह को प्रदर्शित करते रहते हैं। बोलने में वह माहिर हैं ही। चुनाव तक वह अपनी कोशिश को कितनी रफ्तार दे पाते हैं, ये देखना होगा। आज उनके जन्मदिन पर भूली-बिसरी और कुछ ताजी बातें सभी के साथ शेयर करने का मन हुआ तो लिख दिया। यकीन है कि पुष्कर भविष्य में और आगे बढ़ेंगे। सीएम की कुर्सी उनके लिए सिर्फ पड़ाव साबित होगा। न कि मंजिल। नौजवान-स्फूर्तिवान-दृढ़ संकल्प से भरे पुष्कर को जन्मदिन की ढेरों बधाई-हार्दिक शुभकामनाएँ।    

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