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यूरोप की भीषण हीटवेव भारत के लिए बड़ी चेतावनी, बढ़ती गर्मी बन रही है ‘साइलेंट किलर’

यूरोप इन दिनों आसमान से बरसती आग और भीषण गर्मी की अभूतपूर्व चपेट में है। समय से बहुत पहले आई इस खतरनाक हीटवेव (लू) ने कई देशों में आम जनजीवन को पूरी तरह से अस्त-व्यस्त कर दिया है। हालात इतने बेकाबू हैं कि स्कूल बंद करने पड़े हैं, अस्पतालों में पैर रखने की जगह नहीं है और गर्मी के कारण दम तोड़ने वाले लोगों का आंकड़ा लगातार बढ़ता जा रहा है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का साफ मानना है कि यूरोप में आज जो कुछ भी हो रहा है, वह भारत के लिए एक बेहद गंभीर और डरावनी चेतावनी है; क्योंकि हमारे देश में भी हर गुजरते साल के साथ गर्मी का यह प्रकोप और ज्यादा जानलेवा होता जा रहा है।

यूरोप में बढ़ती गर्मी और मौतों का खौफनाक सच
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के आंकड़े बताते हैं कि दुनिया भर में हर साल करीब 4.9 लाख लोगों की मौत गर्मी से जुड़ी वजहों से होती है, और चिंता की बात यह है कि इनमें से लगभग 45 प्रतिशत मौतें अकेले एशिया महाद्वीप में दर्ज की जाती हैं।

WHO के महानिदेशक डॉ. टेड्रोस अधानोम घेब्रेयेसस ने एक बेहद परेशान करने वाली जानकारी साझा की है। उन्होंने बताया कि 21 जून से लेकर अब तक यूरोप में 1,300 से अधिक अतिरिक्त मौतें सिर्फ अत्यधिक तापमान की वजह से हुई हैं। वहीं, फ्रांस के स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक, पिछले कुछ दिनों में देश में सामान्य से करीब 1,000 अधिक मौतें दर्ज की गई हैं। इस खतरे का सबसे ज्यादा शिकार 65 वर्ष से अधिक उम्र के बुजुर्ग हो रहे हैं, जिनके बीच पिछले दो दशकों में गर्मी से होने वाली मौतों का ग्राफ तेजी से ऊपर भागा है।

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भारत के लिए आखिर क्यों बढ़ा है सबसे बड़ा खतरा?
विशेषज्ञों की मानें तो भारत में यह खतरा यूरोप के मुकाबले कहीं अधिक भयावह है। इसके पीछे की जमीनी हकीकत को समझना जरूरी है:

खुले आसमान तले काम: हमारे देश के कई हिस्सों में पारा 45 डिग्री सेल्सियस के पार चला जाता है। ऐसे में देश के करोड़ों मजदूर, किसान, कंस्ट्रक्शन वर्कर और डिलीवरी बॉय खुले आसमान के नीचे कड़ी धूप में काम करने को मजबूर हैं, जहां हीटवेव से बचना लगभग नामुमकिन होता है।

छिपा हुआ ‘साइलेंट किलर’: गर्मी से होने वाली मौतें हमेशा सीधे हीट स्ट्रोक (लू लगना) से नहीं होतीं। जब कोई व्यक्ति लंबे समय तक भीषण गर्मी में रहता है, तो उसे साइलेंटली हार्ट अटैक, किडनी फेल होना, सांस की गंभीर बीमारी और शरीर में पानी की जानलेवा कमी (Severe Dehydration) घेर लेती है। यही वजह है कि कई बार मौत का असली कारण गर्मी होने के बावजूद, वह मेडिकल रिकॉर्ड में दर्ज नहीं हो पाता।

सिर्फ लू नहीं, शरीर के हर अंग पर सीधा हमला
डॉक्टरों का कहना है कि अत्यधिक तापमान हमारे शरीर के भीतर एक तरह का इमरजेंसी जैसे हालात पैदा कर देता है। शरीर को ठंडा रखने के चक्कर में दिल को सामान्य से कई गुना ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है, जिससे किडनी पर दबाव बढ़ता है।

यह भीषण गर्मी पहले से बीमार लोगों (जैसे हृदय रोग, शुगर, अस्थमा या मानसिक तनाव से जूझ रहे मरीजों) की स्थिति को और ज्यादा बिगाड़ देती है। WHO के मुताबिक, हीट स्ट्रोक एक मेडिकल इमरजेंसी है और अगर सही वक्त पर इलाज न मिले, तो जान जाना तय है। हालांकि, शरीर हार मानने से पहले कुछ संकेत देता है—जैसे चक्कर आना, कमजोरी लगना, मांसपेशियों में भयंकर ऐंठन (Cramps), भ्रम की स्थिति और बहुत ज्यादा प्यास लगना। इन्हें कभी भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

कंक्रीट के जंगल और ‘अर्बन हीट आइलैंड’ का अभिशाप
विशेषज्ञों के अनुसार, इस तबाही की सबसे बड़ी जड़ ‘जलवायु परिवर्तन’ (Climate Change) है, जिसकी वजह से हीटवेव अब पहले से कहीं ज्यादा बार और बहुत तीव्र होकर आ रही है। रही-सही कसर हमारे शहरों के बेतरतीब विकास ने पूरी कर दी है। शहरों में कंक्रीट के बढ़ते जंगलों और घटती हरियाली ने ‘अर्बन हीट आइलैंड’ का रूप ले लिया है। इसका नतीजा यह होता है कि कंक्रीट दिनभर की गर्मी को सोख लेता है और रात के समय भी तापमान को कम नहीं होने देता।

भारत के महानगरों की घनी आबादी, झुग्गी-झोपड़ियों या टीन की छतों वाले घरों में रहने वाले गरीब परिवारों के लिए यह स्थिति किसी नरक से कम नहीं है। बिजली और एसी (Air Conditioning) की सीमित सुविधा के चलते लाखों परिवार रात भर उमस और भीषण तपिश में तड़पने को मजबूर रहते हैं।

सेहत ही नहीं, देश की जेब पर भी भारी चोट
यह हीटवेव सिर्फ इंसानी शरीर को ही नहीं तोड़ती, बल्कि हमारी पूरी अर्थव्यवस्था को भी बीमार कर रही है:

इसके आते ही बिजली की मांग रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच जाती है और पानी का संकट गहरा जाता है।

यातायात व्यवस्था सुस्त पड़ जाती है और बाहर काम करने वाले मजदूरों की कार्यक्षमता (Productivity) घट जाती है।

स्कूलों और दफ्तरों को बंद करना पड़ता है, जिससे सीधा आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है।

सबसे ज्यादा मार उन दिहाड़ी मजदूरों, बुजुर्गों और मासूम बच्चों पर पड़ती है, जिनके पास गर्मी से बचने के लिए काम छोड़ने या किसी ठंडी व सुरक्षित जगह पर जाने का कोई विकल्प नहीं होता।

बचाव ही सबसे बड़ा और एकमात्र उपाय है
स्वास्थ्य विशेषज्ञों की यह साफ चेतावनी है कि अगर हम इस खतरे को टालना चाहते हैं, तो सरकारों और नागरिकों दोनों को युद्ध स्तर पर तैयारी करनी होगी।

सरकारों को क्या करना होगा: शहरों में हरियाली का दायरा बढ़ाना, सार्वजनिक जगहों पर पीने के साफ पानी और छांव की व्यवस्था करना, और समय रहते सटीक ‘हीट अलर्ट’ जारी करना बेहद जरूरी है।

व्यक्तिगत स्तर पर सावधानियां: खुद को बचाने के लिए भरपूर पानी पिएं, दोपहर की तीखी धूप में बाहर निकलने से बचें, हमेशा हल्के और ढीले सूती कपड़े पहनें, छांव का सहारा लें और घर के बुजुर्गों व बच्चों की सेहत पर खास नजर रखें।

विशेषज्ञों का यह निष्कर्ष बेहद डराने वाला है कि यदि आज हमने कड़े और प्रभावी कदम नहीं उठाए, तो आने वाले वक्त में यह हीटवेव दुनिया के सामने सबसे बड़ा सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट बनकर खड़ी होगी। भारत जैसे विकासशील देश के लिए यह सिर्फ मौसम का बदलना भर नहीं है, बल्कि यह हमारी सेहत, हमारी अर्थव्यवस्था और सामाजिक सुरक्षा से जुड़ा वजूद का सवाल है।

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