
ग्रेट निकोबार द्वीप पर प्रस्तावित केंद्र सरकार के मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट को लेकर एक बार फिर देश का राजनीतिक पारा चढ़ गया है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने इस महा-परियोजना को पर्यावरण के लिए एक बहुत बड़ा खतरा बताते हुए केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर सीधा निशाना साधा है।
उन्होंने गंभीर चिंता जताते हुए दावा किया है कि इस बड़े निर्माण कार्य से द्वीप की बेहद समृद्ध जैव विविधता (बायोडायवर्सिटी) और वहां का संवेदनशील इकोसिस्टम पूरी तरह तबाह हो सकता है।
संसद से सोशल मीडिया तक चिंताओं का दौर
जयराम रमेश ने सोशल मीडिया पर एक लंबी पोस्ट साझा करते हुए इस मुद्दे पर पिछले कई सालों में किए गए अपने प्रयासों और हस्तक्षेपों का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि वे इस संवेदनशील विषय को संसद में मजबूती से उठा चुके हैं, कई केंद्रीय मंत्रियों को चिट्ठियां लिख चुके हैं और समय-समय पर देश के सामने अपनी आपत्तियां दर्ज कराते रहे हैं। उनका साफ कहना है कि ग्रेट निकोबार जैसी प्राकृतिक रूप से नाजुक जगह पर इतने बड़े पैमाने पर कंक्रीट का जाल बिछाने से कुदरत का संतुलन पूरी तरह बिगड़ जाएगा।
कांग्रेस नेता ने पीएम मोदी को घेरते हुए कहा कि कई कानूनी और पर्यावरणीय आपत्तियां सामने होने के बावजूद सरकार इस प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने पर अड़ी हुई है, जो देश को एक बड़े पर्यावरणीय संकट में धकेल सकता है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि इस मुद्दे पर देश के नागरिक समाज (सिविल सोसाइटी) और पर्यावरण कार्यकर्ताओं का विरोध प्रदर्शन लगातार जारी है।
अदालत में चुनौती: जयराम रमेश ने गिनाईं 5 याचिकाएं
जयराम रमेश ने बताया कि इस मेगा प्रोजेक्ट की मनमानी के खिलाफ कलकत्ता हाईकोर्ट में पांच अलग-अलग याचिकाओं पर इस समय गंभीर सुनवाई चल रही है। इन याचिकाओं में कई कड़े कानूनी सवाल उठाए गए हैं, जैसे:
पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्र (Eco-Sensitive Zone) की अधिसूचना का कथित उल्लंघन।
वन अधिकार अधिनियम (FRA) 2006 का उल्लंघन।
तटीय क्षेत्र विनियमन (CRZ) अधिसूचना 2019 के नियमों की अनदेखी।
पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 के प्रावधानों को दरकिनार करना।
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के 16 फरवरी 2026 के आदेश को दी गई सीधी चुनौती।
जयराम रमेश के शब्दों में कहें तो, “यह मामला अब सिर्फ किसी एक प्रोजेक्ट के बनने या न बनने का नहीं है, बल्कि यह हमारे देश की पर्यावरणीय चेतना की सबसे बड़ी परीक्षा है।”
दूसरी तरफ केंद्र का पक्ष: देश की सुरक्षा और व्यापार के लिए क्यों जरूरी है यह प्रोजेक्ट?
इस तीखे विरोध के बीच केंद्र सरकार ने इस महत्वाकांक्षी परियोजना को लेकर अपना रुख बिल्कुल स्पष्ट रखा है। सरकार का कहना है कि ग्रेट निकोबार परियोजना को देश की समुद्री ताकत और सामरिक (रणनीतिक) क्षमता को कई गुना मजबूत करने के इरादे से तैयार किया गया है। सरकार के मास्टर प्लान के मुताबिक, इस प्रोजेक्ट के तहत ये बड़ी चीजें विकसित की जानी हैं:
एक विश्वस्तरीय अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल।
एक आधुनिक ग्रीनफील्ड अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा।
गैस और सौर ऊर्जा पर आधारित एक बड़ा पावर प्लांट।
एक सर्वसुविधायुक्त हाई-टेक टाउनशिप।
सरकार का तर्क है कि इस बंदरगाह के बनने से भारत की विदेशी ट्रांसशिपमेंट पोर्ट्स पर निर्भरता पूरी तरह खत्म हो जाएगी, जिससे देश का समुद्री व्यापार तेजी से बढ़ेगा और हिंद महासागर क्षेत्र में हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा को अभूतपूर्व मजबूती मिलेगी। फिलहाल, इस पूरे मामले को लेकर एक तरफ ‘प्रकृति के संरक्षण’ और दूसरी तरफ ‘देश के विकास व सुरक्षा’ के बीच संतुलन बनाने की एक बड़ी और गंभीर बहस छिड़ी हुई है।

