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तेल बिगाड़ रहा भारत का खेल: क्या फिर बढ़ेगी महंगाई?

भारत में कच्चे तेल को लेकर एक चिंताजनक स्थिति सामने आ रही है। एक तरफ देश की ऊर्जा जरूरतें तेजी से बढ़ रही हैं, वहीं दूसरी ओर घरेलू कच्चे तेल का उत्पादन लगातार घटता जा रहा है। इसका सीधा असर आम आदमी की जेब, महंगाई और देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है

घटता घरेलू उत्पादन, बढ़ती आयात निर्भरता

भारत का घरेलू कच्चे तेल उत्पादन पिछले डेढ़ दशक से लगातार गिरावट पर है।

2011-12 में उत्पादन: 3.81 करोड़ टन
2020-21 में घटकर: करीब 3.05 करोड़ टन
2025-26 में: लगभग 2.8 करोड़ टन

यानी करीब 26-27% की गिरावट दर्ज की गई है। इसी वजह से अब भारत अपनी जरूरत का करीब 89% कच्चा तेल आयात करता है, जबकि दो दशक पहले यह आंकड़ा लगभग 75% था।

वैश्विक संकट का सीधा असर भारत पर

जब देश इतनी बड़ी मात्रा में तेल आयात करता है, तो अंतरराष्ट्रीय हालात सीधे भारत को प्रभावित करते हैं।

पश्चिम एशिया में तनाव
तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव
सप्लाई चेन में बाधा, इन सभी का असर पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर पड़ता है, जिससे महंगाई बढ़ती है।

अर्थव्यवस्था पर बढ़ता दबाव

तेल की बढ़ती कीमतों का असर केवल ईंधन तक सीमित नहीं रहता।

परिवहन महंगा होता है
कृषि लागत बढ़ती है
उद्योगों की लागत बढ़ती है

इसका नतीजा यह होता है कि रोजमर्रा की चीजें भी महंगी हो जाती हैं।

बड़ी कंपनियों का घटता उत्पादन

देश की सबसे बड़ी तेल कंपनी Oil and Natural Gas Corporation (ONGC) घरेलू उत्पादन का 60-70% हिस्सा देती है।

2011-12 में ONGC का उत्पादन: ~2.37 करोड़ टन
हाल के वर्षों में: ~1.7–2.0 करोड़ टन, पुराने तेल क्षेत्रों का कमजोर होना, नई खोजों की कमी और परियोजनाओं में देरी इसके प्रमुख कारण हैं।

बढ़ती खपत, बढ़ती चुनौती

भारत में तेल की मांग लगातार बढ़ रही है:

2011-12: ~20.4 करोड़ टन
2024-25: ~26.77 करोड़ टन

इसका मतलब है कि मांग और उत्पादन के बीच का अंतर लगातार बढ़ रहा है, जिससे आयात निर्भरता भी बढ़ रही है।

सरकार के प्रयास, लेकिन सीमित असर

सरकार ने उत्पादन बढ़ाने के लिए कई कदम उठाए हैं:

हाइड्रोकार्बन एक्सप्लोरेशन एंड लाइसेंसिंग पॉलिसी (HELP)
ओपन एकरेज लाइसेंसिंग पॉलिसी (OALP)
छोटे तेल क्षेत्रों के विकास की नीति इसके अलावा सरकारी कंपनियों को अधिक स्वायत्तता और निजी निवेश को बढ़ावा भी दिया गया है। फिर भी, उत्पादन में कोई बड़ी बढ़ोतरी नहीं हो सकी है।

क्या फिर बढ़ेंगी पेट्रोल-डीजल की कीमतें?

मौजूदा हालात को देखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि: अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ती हैं
या सप्लाई में कोई बाधा आती है तो भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें फिर बढ़ सकती हैं।

भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह अपनी ऊर्जा जरूरतों को कैसे संतुलित करे। घरेलू उत्पादन बढ़ाना, वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों पर ध्यान देना और आयात पर निर्भरता कम करना—ये तीनों कदम आने वाले समय में बेहद जरूरी होंगे।

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