
सपना देख रहा है, वहीं उत्तराखंड में इसके उलट तस्वीर सामने आ रही है। प्रदेश के 200 सरकारी स्कूलों में चल रहे प्रोफेशनल कोर्स अचानक बंद कर दिए गए हैं, जिससे करीब 20 हजार छात्र-छात्राओं के भविष्य पर अनिश्चितता के बादल मंडराने लगे हैं।
नीति और हकीकत के बीच बढ़ती खाई
नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति का मुख्य उद्देश्य बच्चों को किताबी ज्ञान के साथ-साथ व्यावसायिक कौशल (Vocational Skills) देना है। उत्तराखंड में भी इसका असर दिख रहा था। पिछले साल जहाँ 16,961 छात्रों ने आईटी, पर्यटन और ब्यूटी-वेलनेस जैसे विषय चुने थे, वहीं इस साल यह संख्या बढ़कर 21,850 हो गई। बच्चों का बढ़ता रुझान यह बता रहा था कि वे हुनरमंद बनना चाहते हैं, लेकिन सिस्टम ने उनकी इस उड़ान पर ब्रेक लगा दिया है।
क्यों बंद हुए ये महत्वपूर्ण पाठ्यक्रम?
जानकारी के अनुसार, ‘समग्र शिक्षा’ अभियान के तहत इन कोर्सों को चलाने के लिए नोएडा की एक निजी कंपनी ‘विजन इंडिया सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड’ के साथ 5 साल का अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट) किया गया था। यह अनुबंध 31 मार्च को समाप्त हो गया। इसके बाद, समग्र शिक्षा की राज्य परियोजना निदेशक दीप्ति सिंह ने एक पत्र जारी कर इन कोर्सों के संचालन पर तत्काल रोक लगा दी। नतीजा: 200 स्कूलों की 255 लैब और 28 स्पोक स्कूलों में ताले लटक गए हैं।
10वीं और 12वीं के छात्रों पर दोहरी मार
सबसे ज्यादा संकट बोर्ड परीक्षा वाले छात्रों (10वीं और 12वीं) के सामने है। बच्चों ने विषय तो चुन लिए हैं, लेकिन स्कूलों में उन्हें पढ़ाने वाला कोई नहीं है। नया सत्र शुरू हो चुका है, पर अधिकारियों के पास इस बात का कोई स्पष्ट जवाब नहीं है कि कक्षाएं दोबारा कब शुरू होंगी। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या बिना पढ़ाई के ये बच्चे बोर्ड परीक्षाओं में बेहतर प्रदर्शन कर पाएंगे?
शिक्षक संगठनों में भारी आक्रोश
इस फैसले के खिलाफ राजकीय शिक्षक संघ ने मोर्चा खोल दिया है। संगठन के कुमाऊं मंडल अध्यक्ष डॉ. रविशंकर गुसाईं और मंत्री भारतेंदु जोशी ने माध्यमिक शिक्षा निदेशक को पत्र लिखकर अपनी नाराजगी जताई है। उनका कहना है कि:
“एक तरफ सरकार नई शिक्षा नीति को लागू करने का ढिंढोरा पीट रही है, वहीं दूसरी तरफ कौशल आधारित शिक्षा को ही बंद किया जा रहा है। यह बच्चों के भविष्य के साथ सीधे तौर पर खिलवाड़ है।”
सिस्टम की जवाबदेही पर सवाल
यह घटना उत्तराखंड के शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करती है:
जब अनुबंध खत्म होने की तारीख पहले से तय थी, तो वैकल्पिक व्यवस्था पहले क्यों नहीं की गई?
क्या 20 हजार बच्चों की पढ़ाई को एक प्रशासनिक पत्र के जरिए बीच में ही रोकना उचित है?
‘पहाड़’ के बच्चों को तकनीकी रूप से सक्षम बनाने के दावे क्या केवल कागजों तक सीमित हैं?
उत्तराखंड के अभिभावकों और छात्रों में इस बात को लेकर गहरा असंतोष है। अब देखना होगा कि सरकार इन प्रोफेशनल कोर्सों को दोबारा शुरू करने के लिए क्या कदम उठाती है।



