Uttarakhand

देहरादून की फिजियोथेरेपिस्ट डॉ. मेघा आर्या को राष्ट्रीय सम्मान, देश की 100 आइकॉनिक महिलाओं में हुईं शामिल…

देहरादून। उत्तराखंड के लिए यह गर्व का क्षण है कि देहरादून की जानी-मानी फिजियोथेरेपिस्ट डॉ. मेघा आर्या को देश की 100 सबसे प्रभावशाली (Iconic) महिलाओं की सूची में जगह मिली है। ऑटिज्म के प्रति जागरूकता फैलाने और विशेष बच्चों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया गया है।

बीते 9 मई को नई दिल्ली के एनडीएमसी कन्वेंशन सेंटर में आयोजित एक गरिमामय समारोह में, प्रसिद्ध अभिनेत्री रितु शिवपुरी और ऑर्गेनाइजिंग डायरेक्टर तबस्सुम हक ने डॉ. मेघा को इस प्रतिष्ठित पुरस्कार से नवाजा।

अनुभव से उपजी सेवा की राह
डॉ. मेघा की यह उपलब्धि इसलिए भी खास है क्योंकि उनकी इस सेवा भावना के पीछे उनका अपना व्यक्तिगत संघर्ष छिपा है। एक ऑटिस्टिक बच्चे की माँ होने के नाते उन्होंने उन तमाम चुनौतियों और सामाजिक बाधाओं को बेहद करीब से देखा है, जिनका सामना ऐसे बच्चों के परिवारों को हर दिन करना पड़ता है। उन्होंने अपने इसी दर्द को अपनी ताकत बनाया और समाज के लिए सेवा का माध्यम चुन लिया।

ऑटिज्म के प्रति जागरूकता और थेरेपी में बड़ा योगदान
डॉ. मेघा लंबे समय से ऑटिज्म से पीड़ित बच्चों और उनके माता-पिता के लिए एक मजबूत स्तंभ की तरह खड़ी रही हैं। उन्होंने न केवल क्लिनिकल थेरेपी और प्रशिक्षण पर ध्यान दिया, बल्कि समाज के उस नजरिए को बदलने का काम भी किया जो विशेष बच्चों को अलग दृष्टि से देखता है।

उन्होंने अनेक कार्यशालाओं और व्यक्तिगत सत्रों के जरिए अभिभावकों और शिक्षकों को यह सिखाया कि प्रेम, धैर्य और सही मार्गदर्शन से इन बच्चों को भी समाज की मुख्यधारा से जोड़ा जा सकता है।

कई परिवारों के लिए बनीं ‘उम्मीद की किरण’
बरसों की कड़ी मेहनत और समर्पण का ही परिणाम है कि आज कई विशेष बच्चे आत्मविश्वास के साथ जीवन जीना सीख रहे हैं। डॉ. मेघा ने कई टूटे हुए परिवारों को न केवल मार्गदर्शन दिया, बल्कि उन्हें यह भरोसा भी दिलाया कि सही देखभाल से उनके बच्चों का भविष्य बेहतर हो सकता है।

उत्तराखंड में खुशी की लहर
राष्ट्रीय मंच पर मिली इस पहचान के बाद देवभूमि के चिकित्सा जगत और सामाजिक संगठनों में खुशी की लहर है। लोगों का कहना है कि डॉ. मेघा का यह सम्मान उन सभी के लिए प्रेरणा है, जो विपरीत परिस्थितियों के बावजूद समाज में कुछ सार्थक बदलाव लाने का जज्बा रखते हैं। उनकी यह जीत वास्तव में उन सभी ‘स्पेशल बच्चों’ की जीत है जिनके लिए वे दिन-रात काम कर रही हैं।

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