Uttarakhand

सेकंड सैटरडे की छुट्टी, दफ्तर बंद लेकिन CM के पीछे खड़ा वो अफसर जो खुद ‘एक्शन मोड’ में था!

देहरादून: अमूमन शनिवार (सेकंड सैटरडे) को सरकारी दफ्तरों में सन्नाटा पसरा रहता है, फाइलें अलमारियों में आराम करती हैं और सिस्टम छुट्टी के मूड में होता है। लेकिन बीते शनिवार को उत्तराखंड की सत्ता के गलियारों से लेकर सहसपुर के जनसेवा शिविर तक, एक आईएएस अधिकारी ‘फुल एक्शन मोड’ में नजर आ रहा था।

वाकया सहसपुर में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के जनता दरबार का है। मुख्यमंत्री मंच से लोगों की समस्याएं सुन रहे थे कि तभी भीड़ से निकलकर एक जरूरतमंद महिला ने अपनी आजीविका चलाने के लिए एक अदद सिलाई मशीन की गुहार लगाई। कहने को यह एक आम फरियाद थी, जो अक्सर फाइलों के अंबार में दब जाती है। लेकिन चौकाने वाली बात यह रही कि मंच पर मांग उठी, मुख्यमंत्री ने निर्देश दिए और महज कुछ ही घंटों के भीतर वह सिलाई मशीन उस महिला के घर के आंगन में पहुंच चुकी थी।

फाइलों के फेर से परे: क्या बदल रहा है उत्तराखंड का सिस्टम?
सरकारी व्यवस्था में जहां छोटी-छोटी प्रक्रियाओं और अप्रूवल में हफ्तों लग जाते हैं, वहां इतनी बिजली जैसी तेजी (फास्ट रेजोल्यूशन) कम ही देखने को मिलती है। मुख्यमंत्री के इस ‘ऑन-द-स्पॉट’ फैसले को धरातल पर चंद घंटों में लागू करने के पीछे जिस अधिकारी की सबसे बड़ी और सक्रिय भूमिका रही, वह नाम है बंसीधर तिवारी।

हर मोर्चे पर मुस्तैद: बंसीधर तिवारी उत्तराखंड ब्यूरोक्रेसी का वह चेहरा हैं, जो अक्सर हर बड़े मोर्चे पर खुद कमान संभालते दिखते हैं। मंच पर वीआईपी प्रोटोकॉल की व्यवस्था देखनी हो, स्थानीय जनप्रतिनिधियों के सम्मान का ख्याल रखना हो, मीडिया के तीखे सवालों का सहजता से जवाब देना हो या फिर किसी रोते हुए फरियादी के आंसू पोंछकर उसकी समस्या सुलझानी हो—तिवारी ग्राउंड जीरो पर डटे नजर आते हैं।

जब खुद कुर्सी उठाने से भी नहीं हिचकिचाए IAS अधिकारी
सचिवालय के वातानुकूलित कमरों से इतर, बंसीधर तिवारी की एक खास पहचान उनके सरल और ‘डाउन टू अर्थ’ व्यवहार की भी है। कई कार्यक्रमों में लोगों ने उन्हें मंच पर किसी भी बड़े पद के अहंकार से दूर, खुद अपने हाथों से कुर्सी उठाकर विधायकों या आए हुए अतिथियों को ससम्मान बैठाते हुए देखा है।

मौजूदा समय में मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) में अपर सचिव, सूचना विभाग के महानिदेशक (DG Info) और एमडीडीए (MDDA) के उपाध्यक्ष जैसी बेहद रसूखदार और महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल रहे बंसीधर तिवारी की पहचान अब सिर्फ एक रूतबेदार अफसर की नहीं, बल्कि एक ‘संकटमोचक प्रशासक’ (Problem Solver) की बन चुकी है। वह मौके की नजाकत को बखूबी समझते हैं और मुख्यमंत्री के विजन को कागजों से निकालकर जमीन तक पहुंचाने का हुनर जानते हैं।

“तिवारी जी के दरबार से कोई खाली हाथ नहीं लौटता”
उत्तराखंड की नौकरशाही (Bureaucracy) में अक्सर अफसरों की पहचान उनकी कुर्सी, उनके बंगले या उनकी हनक से मापी जाती है। लेकिन कुछ चेहरे ऐसे होते हैं जो अपनी कुर्सी से नहीं, बल्कि अपनी कार्यशैली और जनता के प्रति अपनी संवेदनशीलता से लोगों के दिलों में जगह बनाते हैं।

जब सरकारी सिस्टम में ‘संवेदनशीलता’ और ‘उपलब्धता’ (Access) दोनों एक साथ मिल जाएं, तो सरकार पर जनता का भरोसा अपने आप मजबूत होने लगता है। शायद यही वजह है कि आज सचिवालय से लेकर आम जनता के बीच लोग दबी जुबान में कहते हैं— “तिवारी जी के दरबार से कोई खाली हाथ नहीं लौटता।”

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