
उत्तराखंड के पहाड़ों से इन दिनों जो तस्वीरें आ रही हैं, वे डराने वाली हैं। एक तरफ चीड़ और बांज के जंगल धू-धू कर जल रहे हैं, वन्यजीव अपनी जान बचाने के लिए भाग रहे हैं और पहाड़ों पर धुएं का गुबार छाया हुआ है। लेकिन दूसरी तरफ, जो खबर सामने आई उसने हर किसी को हैरान कर दिया है। जब वन विभाग के जांबाज कर्मचारियों को जंगलों में मुस्तैद होना चाहिए था, तब सरकार ने उन्हें ‘जनगणना’ के काम में लगा दिया।
इस गंभीर लापरवाही पर अब राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने कड़ा रुख अपनाया है और उत्तराखंड सरकार के साथ-साथ वन विभाग के बड़े अफसरों को कठघरे में खड़ा कर दिया है।
क्या है पूरा मामला? (संकट के समय गलत प्राथमिकता)
उत्तराखंड में हर साल गर्मियों के दस्तक देते ही ‘दावानल’ (जंगल की आग) का खतरा बढ़ जाता है। साल 2024 और उसके बाद भी हालात लगातार चिंताजनक बने हुए हैं। ऐसे संवेदनशील माहौल में, राज्य सरकार ने 25 मार्च को एक आदेश जारी किया। इस आदेश के तहत वन विभाग के मैदानी अधिकारियों और कर्मचारियों की ड्यूटी जनगणना (Census) कार्य में लगा दी गई।
जब जंगलों को बचाने के लिए एक-एक कर्मचारी की जरूरत थी, तब फील्ड स्टाफ को दफ्तरों और गांवों में कागजी आंकड़े जुटाने के काम में झोंक दिया गया। इसी विरोधाभास के खिलाफ एनजीटी में आवाज उठाई गई।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश की सरेआम धज्जियां
इस मामले में सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि सरकार का यह कदम देश की सर्वोच्च अदालत के निर्देशों के बिल्कुल खिलाफ था।
15 मई 2024 का ऐतिहासिक फैसला: सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक स्पष्ट आदेश में कहा था कि उत्तराखंड के वन कर्मियों और वन विभाग के वाहनों का इस्तेमाल चुनाव, चारधाम यात्रा, वीआईपी ड्यूटी या किसी भी अन्य गैर-वन गतिविधि (Non-Forest Activity) में नहीं किया जाना चाहिए।
अदालत का तर्क: अदालत का मानना था कि अगर वन विभाग के अमले को दूसरे कामों में लगाया जाएगा, तो जंगलों की सुरक्षा और वनाग्नि (Forest Fire) नियंत्रण का काम पूरी तरह ठप हो जाएगा। इसके बावजूद, राज्य सरकार ने जनगणना ड्यूटी का आदेश जारी कर दिया।
एनजीटी (NGT) की सख्त कार्रवाई और सुनवाई की रूपरेखा
शिकायतकर्ता के वकील गौरव बंसल ने जब यह मामला एनजीटी के सामने रखा, तो ट्रिब्यूनल की प्रधान पीठ ने इसे बेहद गंभीरता से लिया। इस पीठ में न्यायिक सदस्य न्यायमूर्ति अरुण कुमार त्यागी, विशेषज्ञ सदस्य डॉ. ए. सेंथिल वेल और डॉ. अफरोज अहमद शामिल हैं।
एनजीटी ने देहरादून स्थित प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF – HoFF) को सीधे तौर पर कारण बताओ नोटिस जारी किया है। मामले की रूपरेखा कुछ इस प्रकार तय की गई है:
महत्वपूर्ण तारीखें और एजेंडा
तारीख मुख्य विषय एनजीटी का निर्देश
23 मई तक जवाब दाखिल करने की समयसीमा सुनवाई से कम से कम तीन दिन पहले विस्तृत रिपोर्ट सौंपनी होगी।
26 मई वन अधिकारियों की तैनाती पर सुनवाई एनजीटी इस दिन अधिकारियों की गलत ड्यूटी लगाने के मुद्दे पर फैसला करेगी।
08 जुलाई पर्यावरणीय नुकसान पर सुनवाई जंगलों की आग से हुए अन्य नुकसानों और उपायों पर व्यापक चर्चा होगी।
इस पूरे विवाद की शुरुआत ऋषिकेश-देहरादून मार्ग पर स्थित बड़कोट वन रेंज से हुई थी। वहां सूखी पत्तियां जलाने से हुए पर्यावरणीय नुकसान को लेकर याचिका (दीपिका खारी बनाम पर्यावरण मंत्रालय व अन्य) दायर की गई थी, लेकिन सुनवाई के दौरान वन विभाग की यह बड़ी लापरवाही सामने आ गई।
उत्तराखंड के लिए यह ‘अग्निकांड’ कितना बड़ा खतरा है?
यह केवल किसी एक विभाग की लापरवाही का मामला नहीं है, बल्कि उत्तराखंड के अस्तित्व से जुड़ा सवाल है।
पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) की तबाही: जंगलों की आग से हर साल हजारों हेक्टेयर वन संपदा जलकर खाक हो जाती है। कीमती जड़ी-बूटियां, पेड़-पौधे और जंगलों में रहने वाले बेजुबान जानवर जिंदा जल जाते हैं। ग्लेशियरों पर संकट: पहाड़ों में लगातार उठने वाला धुआं और ‘ब्लैक कार्बन’ वहां के मौसम को गर्म कर रहा है, जिससे ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं।
पानी का संकट: जंगल जलने से प्राकृतिक जल स्रोत (धारे और नौले) सूख जाते हैं, जिससे आने वाले समय में पहाड़ों में पीने के पानी का भयानक संकट पैदा हो जाता है।
मानवीय दृष्टिकोण: सवाल जो पूछे जाने जरूरी हैं
एक आम इंसान के तौर पर जब हम इस खबर को देखते हैं, तो कुछ बुनियादी सवाल प्रशासन की नीयत पर खड़े होते हैं: क्या आंकड़े पेड़ों से ज्यादा जरूरी हैं? जनगणना निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक प्रक्रिया है, लेकिन क्या इसे ऐसे समय पर नहीं टाला जा सकता था जब राज्य के जंगल सुलग रहे हों?
संसाधनों की कमी का रोना क्यों? वन विभाग हमेशा कहता है कि उसके पास आग बुझाने के लिए आधुनिक उपकरण और पर्याप्त कर्मचारी नहीं हैं। ऐसे में जो कर्मचारी उपलब्ध हैं, उन्हें भी हटा लेना कहां की समझदारी है? एनजीटी की इस सख्ती ने सरकार और वन विभाग को आईना दिखाने का काम किया है। उम्मीद है कि 26 मई की सुनवाई में वन विभाग के पास अपनी इस गलती को सुधारने का कोई ठोस रोडमैप होगा, ताकि उत्तराखंड के हरे-भरे पहाड़ों को राख होने से बचाया जा सके।



