
देहरादून: उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में रहने वाले भाई-बहनों में भोजन नली (इसोफेगस) के कैंसर के बढ़ते मामले अब चिकित्सा जगत के लिए बड़ी चिंता का विषय बन गए हैं। इस गंभीर समस्या को देखते हुए देहरादून के प्रसिद्ध श्री महंत इन्दिरेश अस्पताल ने एक व्यापक और वैज्ञानिक शोध (रिसर्च) शुरू करने का बीड़ा उठाया है।
इस शोध का असल मकसद यह पता लगाना है कि आखिर वो कौन से छिपे हुए कारण और जोखिम हैं, जिनकी वजह से पहाड़ के लोगों में यह विशेष कैंसर पैर पसार रहा है। अस्पताल प्रबंधन का मानना है कि इस रिसर्च से जो निष्कर्ष निकलेंगे, वे भविष्य में कैंसर की रोकथाम, समय पर बीमारी को पकड़ने और इसके सटीक इलाज की दिशा बदलने में मील का पत्थर साबित होंगे।
खान-पान से लेकर चूल्हे के धुएं तक; हर पहलू की होगी वैज्ञानिक जांच
इस रिसर्च के तहत मरीजों की पूरी लाइफस्टाइल, उनके रोजमर्रा के खान-पान और आसपास के पर्यावरण का बारीकी से अध्ययन किया जाएगा। वैज्ञानिक कसौटी पर जिन संभावित कारणों की जांच होगी, वे हैं:
तंबाकू, बीड़ी-सिगरेट और शराब के सेवन की आदतें।
पहाड़ों में अत्यधिक गर्म चाय या खौलता हुआ भोजन खाने का रूटीन।
शरीर में जरूरी पोषण की कमी, ताजे फलों और हरी सब्जियों का कम इस्तेमाल।
मोटापा, लगातार रहने वाली एसिडिटी (एसिड रिफ्लक्स)।
पहाड़ी घरों के भीतर चूल्हे या अंगीठी के धुएं का लगातार संपर्क।
वहां के पीने के पानी (पेयजल) की गुणवत्ता और स्थानीय भौगोलिक पर्यावरण।
अस्पताल का कहना है कि किसी भी एक धारणा को सीधे सही मानने के बजाय, हर एक कारण का पुख्ता प्रमाणों के साथ वैज्ञानिक मूल्यांकन किया जाएगा।
‘समय पर इलाज मिले तो कैंसर को हराना मुमकिन’ — डॉ. पंकज कुमार गर्ग
अस्पताल के कैंसर सर्जरी विभाग के प्रमुख डॉ. पंकज कुमार गर्ग ने एक बेहद सकारात्मक जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि अस्पताल में उत्तराखंड के सुदूर पहाड़ी जिलों से हर साल भोजन नली के कैंसर के बहुत से मरीज इलाज के लिए आते हैं। राहत की बात यह है कि इनमें से कई मरीजों का आधुनिक सर्जरी, कीमोथेरेपी और उन्नत तकनीकों से सफल इलाज किया जा चुका है। आज ऐसे कई मरीज हैं जो इलाज पूरा होने के बाद 5 साल से भी अधिक समय से पूरी तरह स्वस्थ और सामान्य जीवन जी रहे हैं। यह इस बात का सबूत है कि सही समय पर इलाज मिलना ही सबसे बड़ी जीत है।
विश्वस्तरीय जांच सुविधाएं और मल्टी-स्पेशलिटी टीम
श्री महंत इन्दिरेश अस्पताल में इसोफेगस कैंसर से लड़ने के लिए हर आधुनिक तकनीक मौजूद है:
एडवांस टेस्ट: अपर जीआई एंडोस्कोपी, बायोप्सी, सीटी स्कैन और हाई-टेक पैथोलॉजी।
उपचार विधियां: कीमोथेरेपी, ओपन सर्जरी और मिनिमली इनवेसिव (दूरबीन वाली) एडवांस कैंसर सर्जरी।
विशेषज्ञों का पैनल: हर जटिल केस में गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट, रेडियोलॉजिस्ट, पैथोलॉजिस्ट, एनेस्थीसिया एक्सपर्ट, क्रिटिकल केयर स्पेशलिस्ट और न्यूट्रिशनिस्ट (पोषण विशेषज्ञ) मिलकर हर एक मरीज के हिसाब से एक कस्टमाइज्ड ‘पर्सनलाइज्ड ट्रीटमेंट प्लान’ तैयार करते हैं।
बिना बड़े चीरे के सफल ऑपरेशन: डॉ. गर्ग ने बताया कि उपयुक्त मरीजों के लिए अस्पताल में ‘मिनिमली इनवेसिव इसोफेगेक्टॉमी’ तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसमें छाती या पेट पर बड़ा चीरा लगाने के बजाय छोटे-छोटे छेदों के जरिए (दूरबीन विधि से) ऑपरेशन होता है। नतीजा यह होता है कि मरीज को दर्द बहुत कम होता है, फेफड़ों में इन्फेक्शन का खतरा घट जाता है और मरीज बहुत जल्दी ठीक होकर अपने पैरों पर खड़ा हो जाता है।
भोजन नली के कैंसर के दो प्रकार:
मेडिकल एक्सपर्ट्स के अनुसार, भोजन नली का कैंसर मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बंटा होता है:
स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा: इसका सीधा संबंध अक्सर तंबाकू, धूम्रपान, शराब, बहुत ज्यादा गर्म खाना-पीना और शरीर में पोषक तत्वों की भारी कमी से देखा जाता है।
एडेनोकार्सिनोमा: यह प्रकार मुख्य रूप से लंबे समय तक रहने वाली एसिडिटी (एसिड रिफ्लक्स), ‘बैरेट इसोफेगस’ नामक बीमारी और अत्यधिक मोटापे की वजह से जन्म लेता है। कई बार मरीजों में ये दोनों तरह के रिस्क फैक्टर्स एक साथ भी पाए जाते हैं।
इन 6 लक्षणों को भूलकर भी न करें नजरअंदाज!
डॉ. पंकज कुमार गर्ग ने आम जनता से बेहद जरूरी अपील करते हुए कहा है कि अगर शरीर में ये लक्षण दिखें, तो उन्हें सामान्य समझकर टालने की भूल बिल्कुल न करें:
खाना निगलने में लगातार दिक्कत होना या भोजन का गले या छाती में अटकना।
बिना किसी डाइटिंग या प्रयास के अचानक तेजी से वजन कम होना।
छाती में लगातार दर्द या तेज जलन (हार्टबर्न) महसूस होना।
बिना किसी सर्दी-जुकाम के लगातार खांसी रहना या आवाज का भारी/बदल जाना।
यदि ऐसे लक्षण लगातार बने हुए हैं, तो तुरंत डॉक्टर से मिलें और जरूरत पड़ने पर ‘अपर जीआई एंडोस्कोपी’ जरूर कराएं। शुरुआती स्टेज में कैंसर का पता चलते ही इसे पूरी तरह जड़ से खत्म करने की संभावना बहुत ज्यादा होती है।
जन-स्वास्थ्य के लिए वरदान बनेगा यह शोध
अस्पताल प्रशासन का साफ कहना है कि यह शोध केवल कागजों या इलाज तक सीमित रहने वाला नहीं है। इस रिसर्च से मिलने वाले डेटा के आधार पर उत्तराखंड के पहाड़ी अंचलों के लिए एक विशेष कैंसर प्रिवेंशन (रोकथाम) गाइडलाइन तैयार की जाएगी। इससे हाई-रिस्क वाले लोगों को समय रहते चिन्हित करने, गांवों में जागरूकता अभियान चलाने और भविष्य में सरकार के लिए एक मजबूत स्वास्थ्य नीति बनाने में बड़ी मदद मिलेगी। जानकारों का मानना है कि देवभूमि में कैंसर नियंत्रण की दिशा में यह अब तक का सबसे ऐतिहासिक कदम साबित होगा।



