
कल्पना कीजिए… धूल से सने खाली बिस्तर, मकड़ी के जाले, जर्जर हो चुकीं बंद इमारतें, जहां सालों से किसी इंसान के कदम न पड़े हों। लेकिन सरकारी फाइलों में उसी जगह पर दर्जनों छात्र बकायदा रह रहे हैं, खाना खा रहे हैं और उनके नाम पर सरकार हर साल लाखों रुपये का फंड भी जारी कर रही है।
यह कोई फिल्मी कहानी नहीं, बल्कि महाराष्ट्र के छात्रावास तंत्र का कड़वा सच है, जिसका पर्दाफाश नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की ताजा कंप्लायंस ऑडिट रिपोर्ट-2024 में हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य में 6 ‘घोस्ट हॉस्टल’ (कागजी हॉस्टल) ऐसे पाए गए, जहां एक भी छात्र नहीं था, फिर भी पिछले 4 सालों में उनके नाम पर 1.62 करोड़ रुपये का सरकारी बजट डकार लिया गया।
जालना के ‘मोदीखान हॉस्टल’ का सबसे बड़ा फर्जीवाड़ा
CAG की टीम ने जब जमीन पर उतरकर सच्चाई देखी, तो अधिकारी भी हैरान रह गए।
कागजों पर रौनक, जमीन पर खंडहर: जालना जिले के मोदीखान हॉस्टल की इमारत पूरी तरह जर्जर और ताले में बंद थी। सरकारी रिकॉर्ड कह रहा था कि यहाँ 38 छात्र और एक वार्डन (अधीक्षक) मौजूद हैं। इस ‘भूतिया’ हॉस्टल के नाम पर सरकार 4 साल तक चुपचाप 18 लाख रुपये मानदेय के रूप में देती रही।
धूल फांकते बिस्तर: जाफराबाद (जालना) के एक अन्य हॉस्टल में, जिसकी क्षमता 24 छात्रों की थी, केवल धूल से ढके खाली बिस्तर मिले। इसके अलावा बुलढाणा और लातूर में भी ऐसे ही फर्जी हॉस्टलों का खेल चल रहा था।
जिन्हें आशियाना मिला, वे बुनियादी हकों को तरसे
यह घोटाला सिर्फ कागजी हॉस्टलों तक सीमित नहीं है। जो छात्र सचमुच सरकारी हॉस्टलों में रह रहे हैं, उनकी स्थिति भी बेहद दयनीय है।
जमीन पर बैठकर भोजन: कई हॉस्टलों में टेबल-कुर्सियां तक नहीं थीं, जिसके कारण छात्रों को जमीन पर बैठकर खाना खाने को मजबूर होना पड़ा। डाइनिंग हॉल, कंप्यूटर लैब, सीसीटीवी, लाइब्रेरी और बिजली बैकअप जैसी सुविधाएं तो जैसे सपना बन चुकी हैं।
दिव्यांग छात्रों के दर्द की अनदेखी: संवेदनहीनता की हद यह रही कि नियमों के मुताबिक दिव्यांग छात्रों को ग्राउंड फ्लोर (भूतल) पर कमरे मिलने चाहिए थे, लेकिन उन्हें ऊपरी मंजिलों पर रहने के लिए मजबूर किया गया।
सुरक्षा राम भरोसे: 280 हॉस्टलों में बायोमेट्रिक मशीनें लगाई तो गईं, लेकिन उनमें से केवल 46 में ही काम कर रही थीं। इसके अलावा, लड़कियों के 5 हॉस्टलों का प्रभारी पुरुष अधीक्षकों को बनाया गया था, जो सुरक्षा के लिहाज से एक गंभीर लापरवाही है।
पैसे की कमी नहीं, नीयत की कमी
हैरानी की बात यह है कि इस अव्यवस्था के बीच बजट की कोई कमी नहीं थी। साल 2023-24 में सरकारी हॉस्टलों के लिए आवंटित बजट में से 56.65 करोड़ रुपये खर्च ही नहीं किए गए और वे वापस लौट गए।
वहीं दूसरी तरफ, सरकार की ढुलमुल नीति के कारण राज्य के 117 तालुकाओं में हॉस्टल बन ही नहीं पाए, जिससे लगभग 8,930 गरीब और पिछड़े वर्ग के छात्र इस मुफ्त सरकारी सुविधा से पूरी तरह वंचित रह गए। वर्ष 2020 तक 500 नए हॉस्टल बनाने का लक्ष्य था, जो 2026 तक भी अधूरा ही है।
यह रिपोर्ट साफ करती है कि कैसे अफसरों और बिचौलियों की मिलीभगत ने उन गरीब और होनहार छात्रों का हक मार लिया, जो बड़े सपने लेकर शहरों में पढ़ाई करने आते हैं।



