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छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ पर सुप्रीम कोर्ट में गुहार: “पेपर लीक करने वालों की संपत्ति हो जब्त”

देश में लगातार हो रहे पेपर लीक मामलों ने लाखों छात्रों और उनके परिवारों को मानसिक और आर्थिक रूप से तोड़ कर रख दिया है। इस गंभीर संकट को देखते हुए अब सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर कर सख्त कार्रवाई की मांग की गई है।

अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दायर इस याचिका में केंद्र और राज्य सरकारों को एक ठोस और समयबद्ध (Time-bound) कार्यप्रणाली तैयार करने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया है।

याचिका की मुख्य मांगें:
कड़ी कानूनी कार्रवाई:
पेपर लीक के मामलों में भ्रष्टाचार विरोधी, मनी लॉन्ड्रिंग और बेनामी संपत्ति जैसे कड़े कानूनों के तहत जांच हो।

संपत्ति की जब्ती: इस अपराध में शामिल मुख्य आरोपियों और उनके उन परिजनों की चल-अचल संपत्ति जब्त की जाए, जो इस अपराध का हिस्सा रहे हैं।

विशेष जांच प्रक्रिया: देश भर में मामलों की त्वरित सुनवाई के लिए एक ‘स्टैंडर्ड प्रश्नावली’ और विशेष जांच प्रक्रिया (SOP) बनाई जाए।

मानवीय दर्द का जिक्र: याचिका में 3 मई, 2026 को हुए NEET पेपर लीक का हवाला देते हुए कहा गया कि ऐसी घटनाओं के कारण युवाओं के सामने रोजगार के अवसर खत्म हो रहे हैं। आर्थिक तंगी और गहरे मानसिक तनाव के चलते कई होनहार छात्र आत्महत्या जैसा आत्मघाती कदम उठाने को मजबूर हो रहे हैं। यह सीधे तौर पर संविधान के अनुच्छेद 14, 16 और 21 के तहत मिले मौलिक अधिकारों का हनन है।

  1. बुजुर्गों के 20 साल के संघर्ष पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: पारसनाथ डेवलपर्स के बैंक खाते फ्रीज
    बिल्डरों की मनमानी और प्रशासनिक ढुलमुल रवैये के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद कड़ा और ऐतिहासिक रुख अपनाया है। अदालत ने रियल एस्टेट कंपनी पारसनाथ डेवलपर्स और उसके निदेशकों के सभी बैंक खातों को तत्काल प्रभाव से फ्रीज करने का आदेश दिया है, साथ ही अधिकारियों के खिलाफ जमानती वारंट भी जारी किए हैं।

क्या है पूरा मामला?
यह लड़ाई कैंसर से जंग जीत चुकीं रीता टिक्कू और लोकेश टिक्कू की है। उन्होंने साल 2006 में गुरुग्राम के ‘पारसनाथ एक्सोटिका’ प्रोजेक्ट में अपने जीवनभर की गाढ़ी कमाई (करीब 1.78 करोड़ रुपये) निवेश की थी। साल 2007 में एग्रीमेंट हुआ और 2013 तक कब्जा मिलना था। लेकिन दो दशक (20 साल) बीत जाने के बाद भी यह बुजुर्ग दंपत्ति अपने आशियाने के लिए भटक रहा है।

कोर्ट की तीखी टिप्पणी:
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने हरियाणा रियल एस्टेट नियामक प्राधिकरण (HRERA) के आदेशों का पालन न होने पर गहरी चिंता जताई।

“अधिकारियों और बिल्डर की मिलीभगत है”

कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि जिला कलेक्टर और स्थानीय पुलिस या तो बिल्डरों के साथ मिले हुए हैं, या फिर अपनी जिम्मेदारी निभाने में पूरी तरह फेल रहे हैं। इसीलिए कोर्ट को खुद आगे आकर यह सख्त कदम उठाना पड़ा।

  1. गोवध निषेध कानून पर सुप्रीम कोर्ट का रुख: “आदेश का उल्लंघन है, तो अवमानना याचिका लाएं”
    सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने उस याचिका पर सुनवाई करने से साफ इनकार कर दिया, जिसमें राज्यों को गोवध निषेध कानूनों को और सख्ती से लागू करने का निर्देश देने की मांग की गई थी।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने याचिकाकर्ता के वकील से कहा कि अगर साल 2005 में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले का जमीन पर पालन नहीं हो रहा है, तो इसके लिए उचित कानूनी रास्ता चुना जाना चाहिए।

कोर्ट की सलाह: पीठ ने कहा, “अगर किसी न्यायिक आदेश का उल्लंघन हो रहा है, तो आपको अवमानना याचिका (Contempt Petition) दायर करनी चाहिए।”

नतीजा: कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद याचिकाकर्ता ने अपनी अर्जी वापस ले ली। कोर्ट ने उन्हें कानून के तहत उपलब्ध अन्य वैधानिक उपायों को अपनाने की छूट दे दी है।

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