
सुप्रीम कोर्ट ने 35 साल पुराने दंगा मामले में एक पुलिस अधिकारी के खिलाफ चल रही कार्रवाई पर रोक लगा दी है, अदालत में या फैसला इसलिए लिया क्योंकि इतने लंबे समय में एक भी गवाह मौखिक दर्ज करने के लिए पेश नहीं हुआ।
दिल्ली, सुप्रीम कोर्ट ने एक पुलिस अधिकारी के खिलाफ चल रहे हैं मुकदमे की कार्यवाही पर रोक लगा दी है, क्योंकि 35 साल गुजर जाने के बावजूद एक भी गवाह को मौखिक सबूत दर्ज कराने के लिए अदालत में पेश नहीं हो पाए, कोर्ट ने स्पष्ट संकेत दिया है कि, वह मामले को केवल देरी के आधार पर खारिज करने के पक्ष में है
सुप्रीम कोर्ट को जस्टिस जे बी पारदीवाला और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच ने उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी करते हुए पूछा है कि, आखिर क्यों इस पुराने मामले को खारिज नहीं किया जाना चाहिए। बेंच ने कहा कि राज्य सरकार को सुनवाई का पूरा अवसर दिए बिना कोई अंतिम आदेश नहीं दिया जाएगा
कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि 35 साल बीते जाने के बावजूद लगभग कोई प्रगति नहीं हुई है ऐसी स्थिति में हम कार्यवाही को खारिज करने के पक्ष में हैं
पुलिस अधिकारी पर क्या है आरोप
पुलिस अधिकारी पर भारतीय दंड संहिता की धारा 147 (दंगा) 323 (चोट पहुंचाना) और 504 (अपमान करना) तथा रेलवे एक्ट की धारा 120 के तहत मुकदमा चल रहा है यह मामला प्रयागराज स्थित एंड एडिशनल चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट की अदालत में लंबित है।
इस मामले में कुछ पांच आरोपी चार्ज शीट किए गए थे, जिस दिन में वर्तमान याचिकाकर्ता पुलिस अधिकारी भी शामिल थे, इसमें से दो सह आरोपी पहले ही मृत्यु हो चुकी है जबकि बचे हुए दो अन्य आरोपियों को अदालत पहले ही बरी कर चुकी है
35 साल में जीरो प्रोग्रेस
अदालत ने गंभीर टिप्पणी की कि पिछले 35 वर्षों में अभियोजन पक्ष ने एक भी गवाह को मौखिक साक्षी के लिए अदालत में पेश नहीं किया, इस लंबी अवधि को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मुकदमे की कार्यवाही पर अंतिम रोक लगाई दी है, कोर्ट ने कहा कि इतने लंबे समय में लंबित रहने वाले मामले आरोपी के लिए अनावश्यक मानसिक और सामाजिक परेशानी का कारण बनते हैं।



