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कोलकाता में खुला देश का पहला ‘शब्द संग्रहालय’, गृह मंत्री अमित शाह आज करेंगे उद्घाटन

कोलकाता: भारत की समृद्ध भाषाई विरासत और हजारों साल पुरानी ज्ञान परंपरा अब एक ही छत के नीचे डिजिटल रूप में जीवंत होने जा रही है। कोलकाता के ऐतिहासिक राष्ट्रीय पुस्तकालय (National Library) परिसर में बने देश के पहले ‘शब्द संग्रहालय’ (Museum of Word) का उद्घाटन आज (रविवार) केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह करेंगे।

यह सिर्फ भारत का ही नहीं, बल्कि दुनिया में अपनी तरह का पहला अनोखा संग्रहालय माना जा रहा है। सबसे खास बात यह है कि आगामी 15 अगस्त तक आम लोगों के लिए इसमें एंट्री बिल्कुल मुफ्त (Free) रहेगी।

पीएम मोदी के एक विचार ने लिया साकार रूप
इस अनोखे म्यूजियम की कहानी साल 2021 से शुरू होती है। जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रीय पुस्तकालय का दौरा किया था, तब उनके मन में भारत की विविध भाषाओं को एक मंच पर लाने का विचार आया था। उनके इसी विज़न को संस्कृति मंत्रालय के तहत ‘नेशनल काउंसिल ऑफ साइंस म्यूजियम’ और ‘राष्ट्रीय पुस्तकालय’ ने मिलकर हकीकत में बदला है।

क्या है इस ‘म्यूजियम ऑफ वर्ड’ में खास?
यह पारंपरिक म्यूजियम की तरह सिर्फ किताबों या कागजों तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी तरह हाईटेक और डिजिटल है। इसमें 22 भारतीय भाषाओं की उत्पत्ति और उनकी विकास यात्रा को दिखाने के लिए 9 अत्याधुनिक डिजिटल गैलरियां बनाई गई हैं।

  • जादुई ‘नवरस गैलरी’ और होलोग्राफी
    म्यूजियम का सबसे बड़ा आकर्षण इसकी ‘नवरस गैलरी’ है। यहाँ होलोग्राफी तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। जैसे ही कोई दर्शक किसी ‘रस’ (जैसे- शृंगार, वीर या करुण रस) को चुनता है, उसके सामने का मंच जीवंत हो उठता है और भारतीय शास्त्रीय नृत्य की एक वास्तविक प्रस्तुति दिखाई देने लगती है।
  • टच एंड प्ले (आरएफआईडी तकनीक)
    बच्चों और युवाओं को आकर्षित करने के लिए यहाँ विशेष रेडियो फ्रीक्वेंसी (RFID) सिस्टम लगाया गया है। किसी भी किताब को एक खास रीडर पर रखते ही, उसकी पूरी कहानी, इतिहास और डिजिटल कंटेंट सामने लगी स्क्रीन पर खुद-ब-खुद चलने लगेगा।
  • इन विषयों पर हैं गैलरियां
    भारतीय भाषाओं और लिपियों का क्रमिक विकास

प्राचीन और दुर्लभ पांडुलिपियां (Manuscripts)

भारत में छपाई (Printing) का इतिहास

हमारी मौखिक (Oral) परंपराएं और ज्ञान-विज्ञान

राष्ट्रीय पुस्तकालय का अपना ऐतिहासिक सफर

क्यों जरूरी है यह कदम?
आज के डिजिटल दौर में जहाँ नई पीढ़ी अपनी मूल भाषाओं से दूर हो रही है, यह संग्रहालय उन्हें अपनी भाषाई जड़ों और संस्कृति से जोड़ने का एक बेहतरीन जरिया बनेगा। यह आने वाले समय में भारतीय भाषाओं और साहित्य के अध्ययन का एक बड़ा राष्ट्रीय केंद्र बनने जा रहा है।

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