
नई दिल्ली: लद्दाख के प्रसिद्ध शिक्षा सुधारक और रेमन मैग्सेसे पुरस्कार विजेता सोनम वांगचुक इन दिनों दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक बार फिर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर हैं। इस बार वे प्रतियोगी परीक्षाओं (विशेषकर NEET-UG) में हुई गड़बड़ियों के खिलाफ छात्रों की आवाज बुलंद कर रहे हैं।
इस बीच, कांग्रेस संसदीय दल की बैठक में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी द्वारा सोनम वांगचुक के आंदोलन को बिना किसी हिचकिचाहट के समर्थन देने के फैसले ने 42 साल पुराने एक ऐतिहासिक और अनसुने अध्याय को दोबारा जिंदा कर दिया है।
कौन थे सोनम वांगचुक के पिता?
सोनम वांगचुक के पिता सोनम वांग्याल लद्दाख की राजनीति के एक बेहद कद्दावर और सम्मानित नेता थे।
कैबिनेट मंत्री रहे: शुरुआत में नेशनल कॉन्फ्रेंस से जुड़े वांग्याल बाद में कांग्रेस में शामिल हो गए थे। वे 1975 में जम्मू-कश्मीर सरकार में कैबिनेट मंत्री भी रहे।
लद्दाख की पहचान के लिए संघर्ष: सोनम वांग्याल ने लद्दाख के बौद्ध और मुस्लिम दोनों समुदायों को एक साथ लाकर लद्दाख को अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा दिलाने के लिए एक लंबा आंदोलन चलाया था।
1984 का वो किस्सा: जब खुद लेह पहुंची थीं इंदिरा गांधी
सोनिया गांधी ने कांग्रेस नेताओं को याद दिलाया कि वांगचुक परिवार और गांधी परिवार का रिश्ता तीन पीढ़ियों पुराना है।
एक गिलास जूस और ऐतिहासिक वादा:
साल 1984 में जब सोनम वांग्याल लद्दाख को एसटी (ST) का दर्जा दिलाने के लिए आमरण अनशन पर बैठे थे, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी खुद स्थिति की गंभीरता को देखते हुए लेह पहुंची थीं। उन्होंने वांग्याल को भरोसा दिया कि केंद्र सरकार उनकी मांग को पूरा करेगी और खुद अपने हाथों से उन्हें जूस पिलाकर उनका अनशन तुड़वाया था। हालांकि उसी साल इंदिरा गांधी की हत्या हो गई, लेकिन बाद में 1989 में राजीव गांधी सरकार ने इस वादे को निभाते हुए लद्दाख को एसटी का दर्जा दिया।
पिता और बेटे के संघर्ष में अद्भुत समानता
चार दशक के अंतराल पर इतिहास ने खुद को दोहराया है। पिता और पुत्र के संघर्ष में कई अनोखी समानताएं और कुछ अंतर भी हैं:
समानता (रास्ता गांधीवादी): पिता सोनम वांग्याल ने भी अपनी बात मनवाने के लिए भूख हड़ताल (1982 में 16 दिन और 1984 में 5 दिन) का रास्ता चुना था। आज बेटे सोनम वांगचुक भी अपनी मांगों के लिए इसी अहिंसक मार्ग पर चल रहे हैं।
अंतर (राजनीति बनाम समाज): पिता कांग्रेस के भीतर रहकर चुनावी राजनीति का हिस्सा थे, जबकि बेटे सोनम वांगचुक ने राजनीति से हमेशा दूरी बनाई रखी। वे एक इंजीनियर और पर्यावरणविद् के तौर पर समाज सुधार में जुटे हैं।
लद्दाख से लेकर दिल्ली के छात्र आंदोलन तक
सोनम वांगचुक ने इससे पहले साल 2024 में लद्दाख की पर्यावरण सुरक्षा और छठी अनुसूची (6th Schedule) की मांग को लेकर 21 दिनों का ‘जलवायु अनशन’ किया था।
अब, वे देश के लाखों छात्रों के भविष्य और परीक्षा प्रणाली में सुधार के लिए जंतर-मंतर पर डटे हैं। सोनिया गांधी के निर्देश के बाद कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने जंतर-मंतर जाकर वांगचुक से मुलाकात की और कांग्रेस की ओर से उन्हें पूरा समर्थन देने का भरोसा दिलाया। इस तरह, बदला हुआ ही सही, लेकिन वांगचुक परिवार और गांधी परिवार का रिश्ता एक बार फिर इतिहास के पन्नों से निकलकर देश की राजनीति के केंद्र में आ गया है।



