
इंदौर : देश को नशामुक्त बनाने के संकल्प (‘नशा मुक्त भारत अभियान’) के तहत प्रवर्तन निदेशालय (ED) के इंदौर सब-जोनल ऑफिस ने एक अंतरराष्ट्रीय ड्रग्स और मनी लॉन्ड्रिंग सिंडिकेट पर अब तक का सबसे बड़ा शिकंजा कसा है। ईडी की टीमों ने मध्य प्रदेश के इंदौर और मंदसौर सहित तेलंगाना के हैदराबाद और राजस्थान के बीकानेर में कई ठिकानों पर एक साथ छापेमारी की।
यह पूरी कार्रवाई 70 किलोग्राम एमडीएमए (मेफेड्रोन) ड्रग्स की तस्करी और उससे कमाए गए करीब ₹70 करोड़ के काले धन को सफेद करने (मनी लॉन्ड्रिंग) के खेल से जुड़ी है।
हाई-टेक सर्विलांस से दबोचा गया ‘फरार’ मुख्य आरोपी
इस पूरी कार्रवाई की सबसे बड़ी कामयाबी रही इस सिंडिकेट के मुख्य सरगना की गिरफ्तारी। दरअसल, इंदौर क्राइम ब्रांच द्वारा एनडीपीएस (NDPS) एक्ट के तहत दर्ज की गई एफआईआर के बाद ईडी ने इस मामले की जांच हाथ में ली थी।
लोकेशन बदल रहा था आरोपी: मुख्य आरोपी पुलिस और एजेंसियों को चकमा देने के लिए लगातार अपने ठिकाने बदल रहा था और अपने ज्ञात पतों से गायब था।
एआई और आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल: ईडी ने हार नहीं मानी और ‘एडवांस्ड एनालिटिकल’ और आधुनिक डिजिटल तकनीकों का इस्तेमाल कर हैदराबाद, बीकानेर और इंदौर में उसकी गतिविधियों को ट्रैक किया।
अज्ञात ठिकाने पर रेड: लगातार कई दिनों की डिजिटल निगरानी के बाद आखिरकार आरोपी को इंदौर के एक ऐसे गुप्त पते से धर दबोचा गया, जिसकी जानकारी पहले किसी एजेंसी को नहीं थी।
गुप्त बैंक लॉकर और करोड़ों की संपत्ति के मिले सुराग
इस छापेमारी के दौरान ईडी के हाथ कई बेहद संवेदनशील और अहम सबूत लगे हैं:
डिजिटल और दस्तावेजी सबूत ज़ब्त: तलाशी के दौरान भारी मात्रा में बेनामी संपत्तियों के कागजात, वित्तीय लेन-देन के रिकॉर्ड और कई डिजिटल डिवाइस (मोबाइल, लैपटॉप) बरामद किए गए हैं, जिन्हें फोरेंसिक जांच के लिए भेजा गया है।
रिश्तेदार के नाम पर लॉकर: जांच के दौरान एक आरोपी के करीबी रिश्तेदार के नाम पर बने एक गुप्त बैंक लॉकर का भी पता चला है। ईडी की टीम इस लॉकर को सीज कर इसकी अलग से जांच कर रही है, जिसमें भारी मात्रा में नकदी या आभूषण होने की आशंका है।
अब खंगाला जाएगा ‘मनी ट्रेल’ का पूरा रास्ता
ईडी के अधिकारियों के मुताबिक, अब जब्त किए गए दस्तावेजों की गहन आर्थिक पड़ताल (Financial Audit) की जा रही है। जांच का मुख्य फोकस ‘मनी ट्रेल’ (पैसे के लेन-देन का रास्ता) को खंगालना है। एजेंसी यह पता लगा रही है कि ड्रग्स बेचकर जो करोड़ों रुपये कमाए गए, उन्हें किन-किन फर्जी कंपनियों (शेल कंपनियों) या वैध कारोबारों में निवेश कर ‘लॉन्ड्रिंग’ (सफेद) किया गया। इस जांच के दायरे में कई बड़े रसूखदार और बिचौलिए भी आ सकते हैं।



