Uttarakhand

उत्तराखंड में बर्फ बन रही आंखों की दुश्मन: पहाड़ों की खूबसूरती के पीछे छिपा दर्द…

उत्तराखंड के बर्फ से ढके पहाड़ दुनिया भर से आने वाले पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। सफेद चादर ओढ़े हिमालय के ये दृश्य किसी स्वर्ग से कम नहीं लगते। लेकिन जिस बर्फ को देखकर पर्यटक रोमांचित हो उठते हैं, वही बर्फ पहाड़ों में रहने वाले हजारों लोगों के लिए एक गंभीर समस्या बनती जा रही है।

उत्तरकाशी, चमोली, पौड़ी, टिहरी और अन्य ऊंचाई वाले इलाकों में रहने वाले लोग आज एक ऐसी बीमारी से जूझ रहे हैं, जिसे डॉक्टर “स्नो ब्लाइंडनेस” यानी बर्फ से होने वाला अंधापन कहते हैं। लगातार बर्फ की चमक और उससे परावर्तित होने वाली तेज पराबैंगनी (यूवी) किरणें धीरे-धीरे आंखों को नुकसान पहुंचा रही हैं।

क्यों खतरनाक है बर्फ की चमक?

विशेषज्ञों के अनुसार, बर्फ सूर्य की किरणों को काफी मात्रा में परावर्तित करती है। ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों में वातावरण पतला होने के कारण पराबैंगनी किरणों का प्रभाव और बढ़ जाता है। जब ये किरणें लंबे समय तक आंखों पर पड़ती हैं, तो रेटिना और कॉर्निया को नुकसान पहुंच सकता है।

शुरुआत में आंखों में जलन, लालिमा, धुंधलापन और तेज रोशनी से परेशानी होती है। लेकिन समय रहते इलाज न मिलने पर स्थिति गंभीर भी हो सकती है। कुछ मामलों में रेटिना के भीतर रक्तस्राव (रेटिनल हेमरेज) तक हो जाता है, जिससे दृष्टि स्थायी रूप से प्रभावित हो सकती है।

“घर से बाहर निकलना भी मुश्किल हो जाता है”

उत्तरकाशी जिले के हर्षिल, गंगोत्री और धराली जैसे इलाकों में कई महीनों तक बर्फ जमी रहती है। यहां रहने वाले लोगों का कहना है कि सर्दियों में घर के बाहर हर तरफ सफेदी ही सफेदी नजर आती है।

हर्षिल के पास सुक्खी गांव के निवासी कमल सिंह राणा और सुगंधा देवी बताते हैं कि बर्फ की चमक इतनी तीव्र होती है कि आंखों के सामने धुंध छा जाती है। आंखों में लगातार चुभन और लालिमा बनी रहती है। कई बार उन्हें नजरें झुकाकर चलना पड़ता है और जरूरत न हो तो घर से बाहर निकलने से भी बचते हैं।

जब बर्फ की वजह से छोड़ना पड़ता है अपना घर

हर्षिल के बगोरी गांव के भूपेंद्र बताते हैं कि उनके इलाके में लगभग पूरे वर्ष बर्फ दिखाई देती है, लेकिन सर्दियों में स्थिति और कठिन हो जाती है। कई परिवारों को कुछ समय के लिए अपना घर छोड़कर निचले इलाकों में जाना पड़ता है।

भूपेंद्र बताते हैं कि बचपन में बर्फ की चमक से उनकी आंखें प्रभावित हुई थीं। उस समय पर्याप्त चिकित्सा सुविधा उपलब्ध नहीं थी और घरेलू उपचारों के सहारे ही राहत मिली। आज भी उनकी दृष्टि पहले जैसी नहीं है।

पौड़ी के निवासी विरेंद्र सिंह भी लंबे समय से इस समस्या का सामना कर रहे हैं। डॉक्टरों के अनुसार उनकी रेटिना प्रभावित हुई है, जिसके कारण उन्हें लगातार चश्मा लगाना पड़ता है।

जवानों के लिए भी बड़ी चुनौती

बर्फीले इलाकों में तैनात आईटीबीपी और आपदा प्रबंधन बलों के जवान भी इस खतरे से अछूते नहीं हैं।

गंगोत्री क्षेत्र में तैनात आईटीबीपी के जवान शिव कुमार बताते हैं कि वर्षों तक बर्फीले क्षेत्रों में ड्यूटी करने के कारण उनकी आंखों में अक्सर सूखापन और जलन बनी रहती है। उन्हें नियमित रूप से आंखों की जांच करानी पड़ती है।

उनके अनुसार सबसे अधिक खतरा तब होता है जब लंबे समय तक सुरक्षात्मक चश्मा पहनने के बाद किसी कारणवश उसे उतारना पड़ जाए। कुछ ही मिनटों में बर्फ की तेज चमक आंखों को गंभीर नुकसान पहुंचा सकती है।

एक साथ 15 जवान हुए थे प्रभावित

श्रीनगर मेडिकल कॉलेज के वरिष्ठ नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. ए.एन. पांडेय बताते हैं कि उनके पास हर साल बड़ी संख्या में ऐसे मरीज पहुंचते हैं। इनमें स्थानीय निवासी, पर्यटक, ट्रेकर, आईटीबीपी और एनडीआरएफ के जवान शामिल होते हैं।

उन्होंने बताया कि इसी वर्ष जनवरी में जोशीमठ के पास एक आईटीबीपी कैंप में तैनात 15 जवान एक साथ स्नो ब्लाइंडनेस की चपेट में आ गए थे। सभी को तत्काल अस्पताल पहुंचाकर उपचार देना पड़ा।

आईटीबीपी के चिकित्सक डॉ. एन. विग्नेशन के अनुसार, ऊंचाई वाले इलाकों में तैनात जवानों को विशेष प्रकार के सीआर-39 लेंस वाले चश्मे दिए जाते हैं और समय-समय पर उनकी आंखों की जांच भी कराई जाती है।

पर्यटकों और ट्रेकर्स के लिए भी चेतावनी

उत्तरकाशी जिला अस्पताल की नेत्र सर्जन डॉ. आस्था रावत बताती हैं कि कई पर्यटक और ट्रेकर फैशन या सुविधा के लिए कॉन्टैक्ट लेंस लगाकर बर्फीले क्षेत्रों में चले जाते हैं।

यह बेहद खतरनाक साबित हो सकता है। कॉन्टैक्ट लेंस के कारण आंखों में संक्रमण और अन्य गंभीर समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है। हर वर्ष उनके पास लगभग 20 ऐसे मरीज पहुंचते हैं जो स्नो ब्लाइंडनेस या उससे जुड़ी समस्याओं से पीड़ित होते हैं।

बचाव ही सबसे बड़ा उपाय

विशेषज्ञों का कहना है कि बर्फीले क्षेत्रों में जाते समय यूवी-प्रोटेक्टेड सनग्लासेस पहनना बेहद जरूरी है। तेज धूप के समय अनावश्यक रूप से बर्फ पर लंबे समय तक नजर नहीं रखनी चाहिए। आंखों में जलन, दर्द या धुंधलापन महसूस होते ही तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।

हिमालय की बर्फ जितनी खूबसूरत दिखती है, उतनी ही खतरनाक भी हो सकती है। इसलिए उसकी सुंदरता का आनंद लेते समय आंखों की सुरक्षा को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। पहाड़ों में रहने वाले लोगों के लिए यह सिर्फ मौसम का हिस्सा नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ी एक गंभीर चुनौती बन चुकी है।

यह संस्करण समाचार रिपोर्ट की बजाय एक मानवीय फीचर-आर्टिकल की तरह पढ़ा जाता है, जिससे पाठक स्थानीय लोगों के दर्द और समस्या को बेहतर तरीके से महसूस कर सके।

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